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उत्तर प्रदेश के मंदिर-मस्जिद विवादों में मध्यस्थता प्रस्ताव ठुकराया गया

उत्तर प्रदेश के मंदिर-मस्जिद विवादों में एक नया मोड़ आया है, जब सुप्रीम कोर्ट द्वारा मध्यस्थता प्रस्ताव को दोनों पक्षों ने अस्वीकार कर दिया। वाराणसी के ज्ञानवापी, मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि और संभल की शाही जामा मस्जिद से जुड़े मामलों में अब अदालत की नियमित सुनवाई के माध्यम से समाधान खोजा जाएगा। जानें इन विवादों में पक्षों के दावे और आगे की प्रक्रिया क्या होगी।
 

नया घटनाक्रम: मंदिर-मस्जिद विवाद


लखनऊ: उत्तर प्रदेश में तीन प्रमुख मंदिर-मस्जिद विवादों में एक नया मोड़ आया है। वाराणसी के ज्ञानवापी, मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह और संभल की शाही जामा मस्जिद से संबंधित मामलों में हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए मध्यस्थता प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया है। अब इन विवादों का समाधान अदालत की नियमित सुनवाई और न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से किया जाएगा।


मध्यस्थता प्रस्ताव का अस्वीकृति

सुप्रीम कोर्ट ने 'समाधान समारोह 2026' के तहत दोनों पक्षों को बातचीत के माध्यम से विवाद सुलझाने का प्रस्ताव दिया था। इसका उद्देश्य लंबे समय से चल रहे मामलों का आपसी सहमति से समाधान निकालना था। हालांकि, दोनों पक्षों ने स्पष्ट किया कि वे अदालत के निर्णय के माध्यम से ही अंतिम परिणाम चाहते हैं, जिससे मध्यस्थता की संभावना समाप्त हो गई है।


पक्षों के दावे

ज्ञानवापी मामले में हिंदू पक्ष का कहना है कि मस्जिद प्राचीन विश्वेश्वर मंदिर के अवशेषों पर स्थित है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे वैध मस्जिद मानता है। मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह के मामले में भी दोनों पक्ष अपने-अपने ऐतिहासिक और कानूनी दावे प्रस्तुत कर रहे हैं। संभल की शाही जामा मस्जिद को लेकर भी मंदिर होने का दावा और उसका विरोध जारी है।


सुनवाई की स्थिति

इन तीनों मामलों से संबंधित विभिन्न याचिकाओं पर जिला अदालतों, इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। इनमें धार्मिक स्थलों के स्वामित्व, पुरातात्विक सर्वेक्षण, पूजा के अधिकार और पूजा स्थल अधिनियम, 1991 से जुड़े कई कानूनी प्रश्न शामिल हैं। विभिन्न अदालतों में विभिन्न पहलुओं पर सुनवाई अभी भी लंबित है।


समाधान समारोह का उद्देश्य

सुप्रीम कोर्ट परिसर में 21 से 23 अगस्त तक 'समाधान समारोह 2026' के तहत विशेष लोक अदालत का आयोजन किया जाएगा। इस पहल का उद्देश्य ऐसे मामलों में आपसी संवाद के माध्यम से समाधान खोजना है, जहां दोनों पक्ष सहमत हों। लेकिन इन तीन विवादों में किसी भी पक्ष ने इस रास्ते को स्वीकार नहीं किया है।


आगे की प्रक्रिया

मध्यस्थता से इनकार के बाद, अब तीनों मामलों की सुनवाई सामान्य न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार जारी रहेगी। दोनों पक्ष अपने दस्तावेज, साक्ष्य और कानूनी तर्क अदालत के समक्ष प्रस्तुत करेंगे। यदि भविष्य में दोनों पक्ष सहमत होते हैं, तो अदालत फिर से मध्यस्थता पर विचार कर सकती है। फिलहाल, अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट और अन्य संबंधित अदालतों के निर्णय के बाद ही सामने आएगा।