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एक साथ चुनाव कराने का प्रस्ताव: क्या सच में होगी बचत?

लोकसभा और सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के प्रस्ताव पर संसदीय समिति विचार कर रही है। भाजपा नेता पीपी चौधरी का दावा है कि इससे सात लाख करोड़ रुपए की बचत होगी और जीडीपी में 1.6 प्रतिशत की वृद्धि होगी। हालांकि, इस दावे की वास्तविकता पर सवाल उठते हैं। क्या यह सिर्फ एक राजनीतिक रणनीति है? जानें इस प्रस्ताव के पीछे के तर्क और खर्च की वास्तविकता।
 

संसदीय समिति का प्रस्ताव

लोकसभा और सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का विचार और इसके बाद सभी स्थानीय निकायों के चुनाव कराने का प्रस्ताव संसदीय समिति के विचाराधीन है। भाजपा नेता पीपी चौधरी की अध्यक्षता में यह समिति हाल ही में गुजरात के दौरे पर गई, जहां उन्होंने एक महत्वपूर्ण दावा किया। उनका कहना है कि यदि देश में सभी चुनाव एक साथ होते हैं, तो इससे लगभग सात लाख करोड़ रुपए की बचत संभव है।


सात लाख करोड़ का दावा

चौधरी ने यह भी कहा कि इससे देश की जीडीपी में 1.6 प्रतिशत की वृद्धि होगी, जिससे बुनियादी ढांचे के विकास के लिए धन उपलब्ध होगा। जब उन्होंने इतनी बड़ी राशि का जिक्र किया, तो यह स्वाभाविक था कि पूर्व सीएजी विनोद राय का नाम याद आया, जिन्होंने संचार घोटाले में एक लाख 76 हजार करोड़ रुपए के नुकसान का आंकड़ा पेश किया था।


खर्च का वास्तविकता

पीपी चौधरी का सात लाख करोड़ रुपए की बचत का आंकड़ा सुनकर विनोद राय के आंकड़े की याद आना महज संयोग नहीं है। जबकि राय का आंकड़ा काल्पनिक था, चौधरी का आंकड़ा वास्तविक है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि यह राशि सरकार के खजाने में जाएगी या नहीं। वास्तव में, चुनावों के खर्च का कोई ठोस आधार नहीं है।


चुनावों का खर्च

पिछले लोकसभा चुनाव के लिए बजट में एक हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था, और चुनाव कराने में मुख्यतः लॉजिस्टिक खर्च होता है। सरकारी कर्मचारी चुनाव में शामिल होते हैं, जिससे अतिरिक्त वेतन का भुगतान नहीं करना पड़ता। यदि पूरे देश में चुनाव कराने का खर्च 10 हजार करोड़ मान लिया जाए, तो भी यह राशि 50 हजार करोड़ से अधिक नहीं होगी।


बचत का सवाल

सवाल यह है कि सात लाख करोड़ रुपए की बचत कहां से होगी? चुनाव में पार्टियों और उम्मीदवारों द्वारा खर्च की गई राशि बचत के दावे को कमजोर करती है। यदि चुनाव एक साथ होते हैं, तो खर्च में थोड़ा बहुत अंतर आ सकता है, लेकिन यह राशि बुनियादी ढांचे के विकास में कैसे उपयोग की जाएगी, यह स्पष्ट नहीं है।


आचार संहिता का प्रभाव

आचार संहिता के लागू होने का तर्क भी गलत है। यदि चुनाव एक साथ होते हैं, तो केवल एक बार आचार संहिता लगेगी, जबकि अलग-अलग चुनावों में दो बार। चुनाव आयोग की अनुमति से सरकार आपात स्थितियों का सामना कर सकती है, इसलिए आचार संहिता के कारण विकास कार्यों में रुकावट का दावा करना गलत है।


निष्कर्ष

सरकार यदि एक साथ चुनाव कराना चाहती है, तो उसे यह करना चाहिए, लेकिन बिना ठोस तर्कों के लोगों को भ्रमित करना उचित नहीं है।