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ऑस्ट्रेलिया की नई रक्षा रणनीति में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका

ऑस्ट्रेलिया ने अपनी नई राष्ट्रीय रक्षा रणनीति 2026 में भारत को एक प्रमुख सुरक्षा भागीदार के रूप में मान्यता दी है। इस रणनीति के तहत, ऑस्ट्रेलिया अगले दशक में 888 अरब डॉलर खर्च करने की योजना बना रहा है, जिसमें नई सैन्य क्षमताओं और तकनीकी विकास पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। ऑस्ट्रेलिया की यह पहल आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिसमें भारत के साथ मिलकर समुद्री सुरक्षा और निगरानी को मजबूत करने का लक्ष्य है। जानें इस नई रणनीति के प्रमुख पहलुओं और भारत के साथ सहयोग के बारे में।
 

ऑस्ट्रेलिया की नई रक्षा रणनीति

ऑस्ट्रेलिया ने अपनी राष्ट्रीय रक्षा रणनीति 2026 को जारी किया है। इस विस्तृत दस्तावेज में भारत का नाम प्रमुखता से उभरा है। ऑस्ट्रेलिया ने भारत को न केवल अपने शीर्ष सुरक्षा साझेदार के रूप में मान्यता दी है, बल्कि हिंद महासागर में इसे अपना सबसे महत्वपूर्ण रक्षा सहयोगी भी घोषित किया है। ऑस्ट्रेलिया के रक्षा मंत्रालय ने एक समेकित निवेश कार्यक्रम पेश किया है, जो अगले 10 वर्षों में यानी 2036 तक का एक रोडमैप प्रदान करता है। इस योजना के तहत, ऑस्ट्रेलिया रक्षा क्षेत्र में अगले दशक में 888 अरब डॉलर खर्च करने की योजना बना रहा है। इसमें से $425 अरब डॉलर नई सैन्य क्षमताओं, आधुनिक हथियारों और तकनीकी विकास पर खर्च किए जाएंगे। इसके अलावा, ऑस्ट्रेलिया 2033 तक अपने रक्षा खर्च को अपनी जीडीपी के 3% तक बढ़ाने का लक्ष्य रखता है, जो किसी विकसित देश के लिए एक महत्वपूर्ण आंकड़ा है। 


आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम

ऑस्ट्रेलिया अब आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया की स्थितियों से सीख लेते हुए, ऑस्ट्रेलिया ने यह समझा है कि भविष्य में यदि आपूर्ति श्रृंखला बाधित होती है, तो उसे अकेले ही इस स्थिति का सामना करना होगा। इसलिए, वह लंबी दूरी की मिसाइलों, न्यूक्लियर पनडुब्बियों और एयर डिफेंस सिस्टम पर भारी निवेश कर रहा है। इस नई रणनीति में भारत को पूर्वोत्तर हिंद महासागर में सबसे महत्वपूर्ण रक्षा भागीदार के रूप में देखा गया है। यह क्षेत्र ऑस्ट्रेलिया के लिए जीवन रेखा है, क्योंकि इसका कच्चा तेल, गैस और कोयला इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है। ऑस्ट्रेलिया जानता है कि यदि उसे इस क्षेत्र में शांति और स्थिरता चाहिए, तो उसे भारत जैसी मजबूत समुद्री शक्ति के साथ सहयोग करना होगा। ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने यह तय किया है कि वह भारत के साथ मिलकर इस समुद्री क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति को नियमित बनाएगी। इसका मतलब है कि ऑस्ट्रेलिया के युद्धपोत, सैनिक और फाइटर जेट्स अब इस क्षेत्र में अक्सर दिखाई देंगे। 


सैन्य सहयोग के तीन मुख्य पहलू

इस नई रणनीति में तीन प्रमुख पहलू शामिल हैं। पहला, निरंतर तैनाती। ऑस्ट्रेलिया अपनी सैन्य टुकड़ियों को इस क्षेत्र में तैनात रखेगा। दूसरा, मजबूत प्रशिक्षण और अभ्यास। भारतीय सेना के साथ मिलकर बड़े स्तर पर युद्धाभ्यास किए जाएंगे। तीसरा, पूरे क्षेत्र में निगरानी। समुद्र के रास्ते कौन आ रहा है और कौन जा रहा है, इस पर बारीकी से नजर रखने के लिए दोनों देश एक मजबूत मेरिटाइम डोमेन अवेयरनेस सिस्टम विकसित करेंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऑस्ट्रेलिया केवल सैन्य उपकरण नहीं लाना चाहता, बल्कि वह भारत के साथ रक्षा उद्योग में भी सहयोग करना चाहता है। इसके लिए शिक्षा और प्रशिक्षण पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। इस रिपोर्ट में क्वाड, जिसमें भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका शामिल हैं, को क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा के लिए एक अनिवार्य साझेदारी बताया गया है। 


क्वाड का उद्देश्य

ऑस्ट्रेलिया चाहता है कि ये चार देश मिलकर समुद्र में डोमेन अवेयरनेस बढ़ाएं। इसका मतलब है कि समुद्र में कौन सा जहाज कहां है और क्या कर रहा है, इस पर ध्यान रखा जाए। आपको बता दें कि क्वाड का मुख्य उद्देश्य हिंद-प्रशांत महासागर क्षेत्र को खुला, सुरक्षित और व्यापार के लिए सुगम बनाना है। सरल शब्दों में कहें तो, इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव और उसकी दादागिरी को रोकने के लिए ये चार प्रमुख देश एकजुट हुए हैं। ये देश केवल सैन्य मोर्चे पर नहीं, बल्कि तकनीक, जलवायु परिवर्तन और आपूर्ति जैसे मुद्दों पर भी एक-दूसरे की मदद करते हैं। और चूंकि इस पूरे क्षेत्र में भारत की स्थिति सबसे मजबूत है, ऑस्ट्रेलिया किसी भी कीमत पर भारत का सहयोग चाहता है।