ओवैसी का नया राजनीतिक दांव: यूपी में गठबंधन की कोशिश
ओवैसी की नई रणनीति
इस बार असदुद्दीन ओवैसी ने खुद चुनावी मोर्चा संभाला है। बिहार विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरूल ईमान ने जो पहल की थी, वही अब ओवैसी खुद कर रहे हैं। ईमान ने राजद और कांग्रेस के साथ तालमेल का प्रस्ताव रखा था, जिसमें उन्होंने कहा था कि सीटें देने के लिए तैयार रहें, लेकिन एकजुट होकर चुनाव लड़ें। यह बात उन्होंने विपक्षी एकता के संदर्भ में कही थी, यह दावा करते हुए कि भाजपा को हराने के लिए सभी विपक्षी दलों का एक साथ आना आवश्यक है। हालांकि, यह समझौता नहीं हो सका, लेकिन ओवैसी की पार्टी ने लगातार दूसरी बार पांच सीटें जीत लीं। अब ओवैसी इसी रणनीति को उत्तर प्रदेश में लागू करने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने सपा और कांग्रेस से गठबंधन करने का आह्वान किया है और इसके लिए दो अक्टूबर तक का समय दिया है। उनका यह अल्टीमेटम राजनीतिक माहौल को गरम कर रहा है।
एआईएमआईएम का विस्तार
ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहाद उल मुसलमीन (एआईएमआईएम), जिसे आमतौर पर ओवैसी की पार्टी कहा जाता है, पहले हैदराबाद तक सीमित थी। लेकिन पिछले एक दशक में, ओवैसी और उनकी पार्टी ने अखिल भारतीय पहचान बनाई है। 2019 के लोकसभा चुनाव में, एमआईएम ने पहली बार हैदराबाद से बाहर एक सीट जीती, जब इम्तियाज जलील ने महाराष्ट्र की औरंगाबाद सीट पर जीत हासिल की। इसके बाद, पार्टी ने महाराष्ट्र में विधानसभा और नगर निगम चुनावों में भी भाग लिया। बिहार में, एमआईएम ने लगातार दो चुनावों में पांच सीटें जीती हैं।
राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव
पिछले एक दशक में, एमआईएम ने एक अखिल भारतीय राजनीतिक ताकत के रूप में अपनी पहचान बनाई है। दिलचस्प बात यह है कि भाजपा का बढ़ता वर्चस्व और एमआईएम की लोकप्रियता एक-दूसरे के साथ बढ़ी है। विपक्षी दलों ने इस तथ्य को समझने में चूक की है और यह साबित करने में लगे रहे हैं कि ओवैसी की पार्टी भाजपा की बी टीम है। ओवैसी ने इस प्रचार को काउंटर करने के लिए चुनाव पूर्व गठबंधन का प्रस्ताव पेश किया है। जैसे बिहार में उनका प्रस्ताव अस्वीकार किया गया, वैसे ही उत्तर प्रदेश में भी ऐसा ही होने की संभावना है। लेकिन इससे ओवैसी की योजना पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण
ओवैसी समझते हैं कि राजनीतिक हालात तेजी से बदल रहे हैं। असम और पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणामों ने देश की राजनीति में एक बड़ा बदलाव लाने की संभावना को जन्म दिया है। मुस्लिम समुदाय अब अपने नेतृत्व की तलाश में तेजी से आगे बढ़ रहा है। हिंदू मतों का ध्रुवीकरण भाजपा के पक्ष में होने के साथ, मुस्लिम मत भी पारंपरिक सेकुलर पार्टियों से दूर जा रहे हैं। सवाल यह है कि वे किसके साथ जाएंगे? ऐसा प्रतीत होता है कि वे ऐसे नेताओं को समर्थन देंगे जो खुलकर मुस्लिम मुद्दों की बात करते हैं।
ओवैसी का उदाहरण
ओवैसी और हुमायूं कबीर जैसे नेता मुस्लिम समुदाय के लिए एक नई दिशा दिखा रहे हैं। पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में हुमायूं कबीर ने बाबरी मस्जिद के निर्माण का ऐलान किया और चुनाव में जीत हासिल की। इसका मतलब यह है कि मुस्लिम समुदाय ऐसे नेताओं को पसंद कर रहा है जो उनके मुद्दों को उठाते हैं। बिहार में ओवैसी की पार्टी ने मुस्लिम बहुल सीटों पर लगातार जीत हासिल की है, जो इस बात का संकेत है कि मुस्लिम मतदाता अब अपनी पहचान को लेकर सजग हो रहे हैं।
भविष्य की संभावनाएं
भारत की सेकुलर पार्टियों को यह समझना होगा कि मुस्लिम मतदाता अब अपनी पहचान और मुद्दों को लेकर सजग हो रहे हैं। यदि वे इस दिशा में कदम नहीं उठाते हैं, तो ओवैसी की पार्टी को इसका लाभ मिल सकता है। मुस्लिम मतदाता अब ऐसे नेताओं को समर्थन देने के लिए तैयार हैं जो खुलकर उनके मुद्दों को उठाते हैं।