कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन: कांग्रेस आलाकमान की वापसी का संकेत
कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन का महत्व
कर्नाटक में डीके शिवकुमार का मुख्यमंत्री बनना केवल एक राज्य में सत्ता परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह कांग्रेस आलाकमान की वापसी का भी संकेत है। 2014 में लोकसभा चुनाव में हार के बाद से सोनिया और राहुल गांधी की शक्ति में कमी आई थी। कांग्रेस केवल चुनाव नहीं हार रही थी, बल्कि नेहरू-गांधी परिवार की कमान भी कमजोर हो रही थी। पार्टी के नेता आलाकमान के निर्देशों की अनदेखी कर रहे थे, जिससे सहयोगी पार्टियों का रवैया भी बदल गया था।
यदि कांग्रेस आलाकमान मजबूत होता, तो तेजस्वी यादव को कांग्रेस के प्रभारी से मिलने की आवश्यकता नहीं होती। इसी तरह, सोनिया गांधी को खुद राज्यसभा की सीट के लिए अनुरोध करने की जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन अब स्थिति बदल गई है। बिहार में राजद की हार, तमिलनाडु में डीएमके और बंगाल में टीएमसी की हार ने कांग्रेस को एक नई ताकत दी है।
कांग्रेस आलाकमान, विशेषकर राहुल गांधी ने अपनी शक्ति को पहचाना है और उसका उपयोग करना शुरू कर दिया है। राष्ट्रीय स्तर पर भी राहुल के नेतृत्व को स्वीकार किया जाने लगा है। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के अच्छे प्रदर्शन और भाजपा के बहुमत गंवाने के बाद से यह बदलाव आया है।
राहुल गांधी ने संविधान की रक्षा, आरक्षण बढ़ाने और जाति गणना कराने जैसे मुद्दों पर बात की है, जो देश में चर्चा का विषय बने हैं। जब केंद्र सरकार ने जाति जनगणना कराने का ऐलान किया, तो इससे राहुल की राजनीति को मजबूती मिली। सोशल मीडिया पर उनके द्वारा बनाए गए नैरेटिव को भाजपा को स्वीकार करना पड़ा।
इस प्रकार, राहुल गांधी की हैसियत बढ़ी है और उनके नैरेटिव को राजनीतिक मंच पर जगह मिली है। अब उन्होंने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हुए ऐसे निर्णय लेने शुरू कर दिए हैं, जो कांग्रेस के लिए आवश्यक हैं। पहले भी सोनिया और राहुल ने महत्वपूर्ण फैसले लेने की कोशिश की थी, लेकिन क्षत्रपों ने उन्हें विफल कर दिया था।
राजस्थान में अशोक गहलोत ने पार्टी नेतृत्व के निर्देशों का उल्लंघन किया था, जिससे कांग्रेस को नुकसान हुआ। इसी तरह, छत्तीसगढ़ में भी सोनिया और राहुल गांधी भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव के विवाद को सुलझा नहीं सके।
अब राहुल गांधी ने अपनी शक्ति को संचित किया है और उसे लागू करने का प्रयास कर रहे हैं। केरल में वीडी सतीशन का मुख्यमंत्री बनना इसी का एक उदाहरण है। कांग्रेस के बड़े नेताओं ने केसी वेणुगोपाल के लिए माहौल बनाया, लेकिन राहुल ने सतीशन को सीएम बनवाया।
कांग्रेस पार्टी का इकोसिस्टम अब यह नैरेटिव बनाता है कि राहुल गांधी एक साहसी नेता हैं, जो सरकार पर खुलकर हमला करते हैं। हालांकि, यह छवि भी बनी थी कि वे पार्टी में अपने हिसाब से फैसले नहीं करा पाते। अब वह छवि बदल गई है।
हालांकि, मीडिया और राइटविंग इकोसिस्टम राहुल गांधी बनाम प्रियंका गांधी वाड्रा की बहस करने की कोशिश कर रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि डीके शिवकुमार प्रियंका की पसंद हैं। लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि प्रियंका भी कांग्रेस आलाकमान का हिस्सा हैं।
अगर कांग्रेस अगले साल के चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करती है, तो आलाकमान की स्थिति और मजबूत होगी।