कांग्रेस का नया रुख: सहयोगियों के लिए चिंता का विषय
कांग्रेस का चुनावी रणनीति में बदलाव
तमिलनाडु के चुनाव परिणामों के बाद कांग्रेस ने जो कदम उठाया है, वह उसकी सहयोगी पार्टियों के लिए चिंता का कारण बन सकता है। राहुल गांधी ने स्पष्ट संकेत दिया है कि सहयोगी दलों को कांग्रेस पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। पार्टी ने यह भी संकेत दिया है कि वह अपने रास्ते पर चल सकती है। इसीलिए, कांग्रेस ने केवल विजय की पार्टी को समर्थन नहीं दिया, बल्कि राहुल गांधी ने उनकी शपथ ग्रहण समारोह में भी भाग लिया। यह ध्यान देने योग्य है कि कांग्रेस के केवल पांच विधायक चुनाव में जीत पाए हैं, जिससे उनकी सरकार में भूमिका काफी सीमित रहने वाली है। पहले दिन की शपथ में मुख्यमंत्री विजय ने केवल अपनी पार्टी के नौ विधायकों की शपथ ली, जबकि कांग्रेस के मंत्रियों की शपथ बाद में होगी। फिर भी, राहुल गांधी ने शपथ समारोह में भाग लिया और मंच पर उपस्थित रहे। इसका एक पहलू यह है कि कांग्रेस को लगता है कि द्रविडियन पार्टियों की कमजोरी से उसे लाभ मिल सकता है। राहुल को यह भी विश्वास है कि विजय का प्रभाव अगले कुछ वर्षों तक बना रहेगा, जिससे कांग्रेस 2029 के लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन कर सकेगी।
सहयोगी दलों के लिए संदेश
दूसरी ओर, कांग्रेस ने सहयोगी दलों को एक स्पष्ट संदेश दिया है। याद रहे कि 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले डीएमके ने अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा की थी। इसी तरह, 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले ममता बनर्जी ने विपक्षी गठबंधन से अलग होने की बात कही थी। बिहार में राजद के साथ सीट बंटवारे में समस्याएं आईं, जबकि असम में झारखंड मुक्ति मोर्चा ने कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने के लिए 12 सीटों पर उम्मीदवार उतारे। आम आदमी पार्टी के साथ भी कांग्रेस के संबंध कुछ खास नहीं रहे हैं। इस बार, कांग्रेस ने नतीजों के तुरंत बाद डीएमके को छोड़कर जीतने वाली पार्टी टीवीके को समर्थन देने का निर्णय लिया। इस फैसले का तात्कालिक प्रभाव समाजवादी पार्टी पर पड़ेगा, जिससे राहुल ने अखिलेश यादव की चिंता बढ़ा दी है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारी
अगले साल मार्च में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और सपा ने मिलकर चुनाव लड़ा था, जिसमें सपा ने कांग्रेस को 17 सीटें दी थीं, जिनमें से कांग्रेस ने छह पर जीत हासिल की थी। दूसरी ओर, सपा ने 63 सीटों में से 37 जीती थीं, जिसका स्ट्राइक रेट 60 प्रतिशत था, जबकि कांग्रेस का 35 प्रतिशत था। इस आधार पर, सपा के नेता मानते हैं कि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को कम सीटें दी जाएंगी। वहीं, कांग्रेस ने यह स्पष्ट किया है कि वह एक सौ सीटों से कम पर चुनाव नहीं लड़ेगी। सपा के लिए कांग्रेस को मनाना आसान नहीं होगा। लेकिन सवाल यह है कि कांग्रेस के पास विकल्प क्या हैं? क्या वह अकेले चुनाव लड़ सकती है या बहुजन समाज पार्टी के साथ तालमेल बनाने की कोशिश करेगी? इस समय यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन सपा के लिए यह एक चुनौती है। झारखंड में हेमंत सोरेन के रुख को देखते हुए कांग्रेस अकेले राजनीति करने की योजना बना रही है। बिहार में तो वह पहले से ही अकेले चुनाव लड़ रही है। महाराष्ट्र में शरद पवार की पार्टी के दोनों धड़ों के विलय के बाद की राजनीति पर भी कांग्रेस की नजर है। कांग्रेस के जानकार नेताओं का मानना है कि कई क्षेत्रीय पार्टियां भाजपा के संपर्क में हैं और कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने की राजनीति कर रही हैं। इसलिए, कांग्रेस अब अपनी रणनीति के अनुसार उन्हें संभालने की योजना बना रही है।