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कांग्रेस का मनरेगा बचाओ आंदोलन: 45 दिन का संघर्ष शुरू

कांग्रेस पार्टी ने मनरेगा बचाओ आंदोलन की शुरुआत की है, जो 10 जनवरी से 45 दिनों तक चलेगा। इस आंदोलन की तैयारी लगभग 20 दिनों से चल रही थी, और इसे पार्टी के कई नेता गेमचेंजर मानते हैं। हालांकि, इस आंदोलन में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा की अनुपस्थिति ने सवाल उठाए हैं। जानें इस आंदोलन की पूरी कहानी और इसके पीछे की रणनीति।
 

कांग्रेस का आंदोलन

कांग्रेस पार्टी ने देशभर में मनरेगा बचाओ आंदोलन की शुरुआत की है। इस आंदोलन की तैयारी लगभग 20 दिनों से चल रही थी। पिछले महीने, 19 दिसंबर को संसद के शीतकालीन सत्र के समाप्त होने से पहले, केंद्र सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना (मनरेगा) को समाप्त कर दिया और इसके स्थान पर विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन ग्रामीण (वीबी जी राम जी) बिल को पास किया। दो दिन बाद, राष्ट्रपति ने इस बिल को मंजूरी दी और यह कानून बन गया। जैसे ही यह बिल संसद में पेश हुआ, कांग्रेस ने इसका विरोध शुरू कर दिया और बड़े आंदोलन की योजना बनाई। पहले यह तय हुआ कि आंदोलन 28 दिसंबर को स्थापना दिवस पर शुरू होगा, लेकिन दिग्विजय सिंह के कारण यह मामला संगठन की कमजोरियों की ओर मुड़ गया। अंततः, आंदोलन की तारीख 10 जनवरी तय की गई।


आंदोलन की तैयारी

इस प्रकार, 10 जनवरी से कांग्रेस ने 45 दिनों का आंदोलन शुरू किया है, जिसे पार्टी के कई नेता गेमचेंजर मानते हैं। उनका मानना है कि मनरेगा को छेड़कर केंद्र सरकार ने एक बड़ी गलती की है, जिसका कांग्रेस पिछले 12 वर्षों से इंतजार कर रही थी। हालांकि, इस बड़े आंदोलन के दौरान न तो राहुल गांधी और न ही प्रियंका गांधी वाड्रा उपस्थित थे। कांग्रेस के संचार विभाग के प्रमुख जयराम रमेश ने आंदोलन की शुरुआत की घोषणा की। यह ध्यान देने योग्य है कि 45 दिन का यह आंदोलन दिल्ली से लेकर राज्यों के मुख्यालयों और जिला स्तर पर प्रदर्शन करेगा। राजभवनों के घेराव की योजना भी बनाई गई है।


नेताओं की अनुपस्थिति

हालांकि, कांग्रेस के शीर्ष नेता इस आंदोलन का चेहरा नहीं हैं। जब संसद में इस बिल पर चर्चा हुई, तब भी सोनिया, राहुल या प्रियंका गांधी ने बहस में भाग नहीं लिया। राहुल उस समय विदेश में थे और उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी बात रखी। पहले ऐसा लग रहा था कि कांग्रेस आंदोलन की तारीख इसलिए बढ़ा रही है ताकि राहुल गांधी वियतनाम से लौटकर इसका नेतृत्व कर सकें। लेकिन इस बीच, प्रियंका गांधी भी अमेरिका के निजी दौरे पर चली गईं। सोनिया गांधी की सेहत भी ठीक नहीं है, जिससे आंदोलन बिना बड़े नेताओं के शुरू हो गया है।


भविष्य की संभावनाएँ

यह संभव है कि इस डेढ़ महीने के आंदोलन के दौरान राहुल और प्रियंका इसमें शामिल हों, लेकिन यदि कांग्रेस को लगता है कि यह एक बड़ा अवसर है, तो बड़े नेताओं को इसका नेतृत्व करना चाहिए। भाजपा विरोधी राज्यों की सरकारें विधानसभा से इसके खिलाफ प्रस्ताव पास कर रही हैं, और कांग्रेस के नेताओं को इन सरकारों को भी अपने साथ जोड़ने का प्रयास करना चाहिए।