कांग्रेस का वंदे मातरम पर नया रुख: टकराव की राजनीति का संकेत
कांग्रेस का नया स्टैंड
कांग्रेस पार्टी ने वंदे मातरम को एक महत्वपूर्ण मुद्दा बना दिया है, जिससे राजनीतिक टकराव उत्पन्न हो रहा है। यह बदलाव अचानक आया है, क्योंकि मानसून सत्र के दौरान कांग्रेस ने इस पर अपने विचार स्पष्ट नहीं किए थे। पार्टी के नेता इस बात से संतुष्ट थे कि जंतर मंतर पर पुलिस कार्रवाई के कारण संसद की कार्यवाही बाधित हुई, जिससे वंदे मातरम का बिल बिना किसी बहस या मतदान के पारित हो गया। एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा कि यदि संसद सामान्य रूप से चल रही होती, तो पार्टी को अपने विचार स्पष्ट करने पड़ते।
कांग्रेस ने अब स्पष्ट रूप से यह निर्णय लिया है कि वह वंदे मातरम के सभी छह अंतरों को गाने के कानून का विरोध करेगी। राज्य सरकारों ने प्रस्ताव पारित किया है कि उनके कार्यक्रमों में केवल दो अंतरे गाए जाएंगे। कर्नाटक ने कहा है कि राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और राज्यपाल के कार्यक्रमों को छोड़कर अन्य कार्यक्रमों में केवल दो अंतरे गाए जाएंगे। अब यह देखना होगा कि केंद्र सरकार इस खुले उल्लंघन पर क्या कदम उठाती है। लेकिन यह स्पष्ट है कि कांग्रेस टकराव की राजनीति की ओर बढ़ रही है।
यह आश्चर्यजनक है कि कांग्रेस इस मुद्दे पर अपनी सहयोगी पार्टियों और विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' के घटक दलों से भी विवाद कर रही है। उसे पता है कि सहयोगी पार्टियां उसके समान कठोर रुख नहीं अपना रही हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस से लेकर तृणमूल कांग्रेस तक इस मुद्दे पर अलग-अलग विचार हैं। फिर भी, कांग्रेस को इस मुद्दे से राजनीतिक लाभ मिल रहा है।
हाल ही में जम्मू कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने इस पर अलग रुख अपनाया। कम से कम दो सरकारी कार्यक्रमों में पूरा वंदे मातरम गाया गया, और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला तथा उनके पिता फारूक अब्दुल्ला ने राष्ट्रगीत के सम्मान में खड़े होकर इसका सम्मान किया। कांग्रेस ने इस पर सवाल उठाया और केसी वेणुगोपाल ने उमर अब्दुल्ला की आलोचना की। नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेताओं का मानना है कि वे केंद्र सरकार के साथ इस मुद्दे पर टकराव नहीं लेना चाहते।
कांग्रेस को यह भी पता है कि पश्चिम बंगाल की मुख्य विपक्षी पार्टी तृणमूल कांग्रेस इस मुद्दे पर उसका समर्थन नहीं कर सकती। बंगाल में एक बड़ा सांस्कृतिक मुद्दा है, और तृणमूल कांग्रेस इसे जोखिम में नहीं डालना चाहती। फिर भी, यदि कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोपों की परवाह किए बिना यह मुद्दा उठा रही है, तो इसका अर्थ यह भी है कि वह जम्मू कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और केरल में मुस्लिम लीग से भी अधिक कट्टरपंथी दिखना चाहती है ताकि मुस्लिम वोट उसकी ओर आकर्षित हो सकें।