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कांग्रेस की केरल में चुनावी चुनौतियाँ: 2021 की हार के बाद की स्थिति

कांग्रेस केरल में 2021 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद अपनी स्थिति को समझने में असफल रही है। 2019 में लोकसभा चुनाव में शानदार जीत के बावजूद, पार्टी को 2021 में भारी नुकसान उठाना पड़ा। अब, 2024 के चुनावों के लिए कांग्रेस ने नई उम्मीदें जगाई हैं, लेकिन आंतरिक गुटबाजी और मुस्लिम वोटों पर निर्भरता जैसी चुनौतियाँ बनी हुई हैं। भाजपा की बढ़ती ताकत और लेफ्ट के खिलाफ एंटी इन्कम्बैंसी भी कांग्रेस के लिए चिंता का विषय है। क्या कांग्रेस इस बार अपनी खोई हुई जमीन वापस पा सकेगी? जानिए इस लेख में।
 

कांग्रेस की हार का रहस्य

पांच साल बीत जाने के बावजूद कांग्रेस यह नहीं समझ पाई है कि 2021 के विधानसभा चुनाव में उसकी हार का कारण क्या था। 2019 के लोकसभा चुनाव में, कांग्रेस ने राज्य की 20 में से 19 सीटें जीती थीं। हालांकि, राहुल गांधी अमेठी में हार गए थे, लेकिन उन्होंने केरल की वायनाड सीट पर शानदार जीत हासिल की। दो साल तक केरल की राजनीति में सक्रिय रहने के बावजूद, 2021 में कांग्रेस को भारी हार का सामना करना पड़ा। पार्टी के नेता अब तक इस बात का पता नहीं लगा पाए हैं कि आखिरकार केरल में हार क्यों हुई। यह स्थिति कांग्रेस के लिए चिंताजनक है, क्योंकि स्वतंत्रता के बाद से केरल में हर पांच साल में सत्ता बदलने की परंपरा रही है, जो 2021 में टूट गई। सीपीएम के नेतृत्व वाला लेफ्ट मोर्चा लगातार दूसरी बार चुनाव जीत गया।


2024 के चुनावों की उम्मीदें

कांग्रेस को उम्मीद है कि 2021 का चुनाव एक अपवाद था और वह इस बार बड़ी जीत हासिल करेगी। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस गठबंधन ने शानदार प्रदर्शन किया, जिसमें उसने सभी 20 सीटें जीतीं। स्थानीय निकाय चुनावों में भी कांग्रेस को सफलता मिली, जहां उसने छह नगरीय निकायों में से चार में जीत दर्ज की। 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद, कांग्रेस ने 2020 में स्थानीय निकाय चुनावों में हार का सामना किया था, लेकिन इस बार स्थिति अलग रही।


केरल की राजनीतिक धारणाएँ

केरल के बारे में हिंदी पट्टी में कई गलत धारणाएँ हैं, जैसे कि मुस्लिम और ईसाई आबादी का 45 प्रतिशत होना। वास्तव में, केरल की राजनीति में 55 प्रतिशत हिंदू वोटर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ब्राह्मण और पिछड़ी जातियों, विशेषकर एझवा, का भी राजनीतिक प्रभाव है। मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन ने एझवा के एक प्रमुख नेता वेल्लापल्ली नतेशन को अपने साथ रखा है, जो मुस्लिम विरोधी भाषणों के लिए जाने जाते हैं।


भाजपा की बढ़ती ताकत

भारतीय जनता पार्टी ने हिंदू वोटों को एकजुट करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाए हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा को 12 प्रतिशत से अधिक वोट मिले थे, लेकिन उसे कोई सीट नहीं मिली। 2024 के लोकसभा चुनाव में, भाजपा को 19 प्रतिशत से अधिक वोट मिले और उसने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। त्रिशुर में सुरेश गोपी ने चुनाव जीता, जबकि तिरूवनंतपुरम में राजीव चंद्रशेखर ने शशि थरूर से केवल 16 हजार वोटों से हार का सामना किया।


कांग्रेस की आंतरिक चुनौतियाँ

कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी समस्या गुटबाजी है। केरल कांग्रेस में कई गुट हैं और कोई एक केंद्रीय नेता नहीं है। एके एंटनी के सक्रिय रहने के दौरान, वे केरल के फैसले लेते थे। अब, कई नेता अपने-अपने गुट बना चुके हैं। यह धारणा बनी हुई है कि अगर कांग्रेस जीतती है, तो केसी वेणुगोपाल मुख्यमंत्री बन सकते हैं।


भविष्य की चुनौतियाँ

कांग्रेस को मुस्लिम लीग की सीटों की मांग और मुस्लिम वोटों पर निर्भरता जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। दूसरी ओर, लेफ्ट के गठबंधन को 10 साल की एंटी इन्कम्बैंसी का सामना करना पड़ रहा है। पिनरायी विजयन पर कई आरोप लगे हैं, और उनकी बेटी के खिलाफ जांच चल रही है। लोकसभा और स्थानीय निकाय चुनावों में लेफ्ट की हार ने पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा दिया है।