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कांग्रेस के वंदे मातरम विवाद: क्या है असली कहानी?

कांग्रेस मुख्यालय में 15 अगस्त को वंदे मातरम के दौरान उत्पन्न विवाद ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या यह एक सामान्य घटना थी या इसके पीछे कोई गहरी कहानी है? जयराम रमेश के बयान और घटनाक्रम के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि कांग्रेस के नेता इस कानून के प्रति सजग नहीं थे। जानिए इस विवाद के पीछे की असली कहानी और कांग्रेस की राजनीतिक स्थिति पर इसका प्रभाव।
 

कांग्रेस मुख्यालय में वंदे मातरम का विवाद


15 अगस्त को कांग्रेस के इंदिरा भवन में झंडा फहराने के दौरान वंदे मातरम को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ। क्या यह एक सामान्य घटना थी या इसके पीछे कोई गहरी कहानी है? जयराम रमेश ने कहा कि सोनिया गांधी ने वंदे मातरम को रोकने का प्रयास नहीं किया। उनके अनुसार, कांग्रेस अध्यक्ष खड़े थे, इसलिए सोनिया ने उनके लिए कुर्सी लाने को कहा। हालांकि, वीडियो में ऐसा नहीं दिखता। यदि यह सच भी है, तो कई गंभीर सवाल उठते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि कानूनी समस्याओं से बचने के लिए यह कहानी बनाई गई।


घटनाक्रम को समझने पर पता चलता है कि वंदे मातरम के पहले दो अंतरे सामान्य रहे, लेकिन जैसे ही तीसरा अंतरा शुरू हुआ, राहुल गांधी की भौहें तनीं। वे कैमरे के प्रति सजग थे, इसलिए कुछ नहीं बोले। लेकिन सोनिया और खड़गे ने बोलना शुरू कर दिया। सवाल यह है कि क्या उन्हें इस कानून की जानकारी नहीं थी? क्या उन्हें नहीं पता था कि राष्ट्रगीत को रोकने पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है? यह कैसे संभव है?


कांग्रेस के कार्यक्रम में वंदे मातरम का न बजना कानूनी रूप से कोई अपराध नहीं होता, क्योंकि यह केवल सरकारी समारोहों के लिए अनिवार्य है। लेकिन यदि यह निजी समारोह में बजता है, तो उसे पूरा गाना आवश्यक है। यह बात कांग्रेस के नेताओं को अवश्य पता होगी। फिर भी, यह घटनाक्रम हुआ, जिससे यह संकेत मिलता है कि शायद कांग्रेस ने कानून के खिलाफ अपनी असहमति जताने के लिए पूरा वंदे मातरम गाने का निर्णय लिया।


कांग्रेस हमेशा से वंदे मातरम को लेकर असहज रही है। 1937 में प्रारंभिक दो पद गाने की परंपरा को कांग्रेस ने बनाए रखा है। भाजपा सरकार ने सभी छह पद गाना अनिवार्य कर दिया है और इसे अपमान का कानून भी बना दिया है। यह कानून कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहा है।