कांग्रेस ने पीएम मोदी से शंकराचार्य मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की
कांग्रेस का पत्र: संतों की आवाज़ को दबाने की कोशिश न करें
नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अजय राय ने सोमवार को ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के समर्थन में एक खुला पत्र लिखा। उन्होंने कहा कि सरकार की शक्ति का उपयोग करके संतों की आवाज़ को दबाने का प्रयास बंद होना चाहिए। अजय राय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भेजकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी के खिलाफ दर्ज 'पॉक्सो प्रकरण' की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की मांग की है।
उन्होंने कहा कि यह कार्रवाई तब हुई जब स्वामी जी ने कुंभ मेले में प्रशासनिक अव्यवस्थाओं पर सरकार की आलोचना की थी, जो सीधे तौर पर 'राजनीतिक प्रतिशोध' का संकेत देती है। कांग्रेस का मानना है कि अनुच्छेद 25-26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान होना चाहिए। किसी आध्यात्मिक पद का राजनीतिक उपयोग करना लोकतंत्र और संविधान के खिलाफ है। हम मांग करते हैं कि इस मामले की जांच किसी स्वतंत्र या केंद्रीय एजेंसी द्वारा की जाए ताकि सच्चाई सामने आ सके।
अजय राय ने कहा कि हाल ही में विभिन्न समाचार माध्यमों में प्रकाशित खबरों से यह स्पष्ट है कि ज्योतिर्मठ पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के खिलाफ पॉक्सो अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है। यह प्राथमिकी न्यायालय के निर्देशों के अनुसार दर्ज की गई है। न्यायालय के आदेशों का सम्मान करना सभी नागरिकों और शासन का कर्तव्य है, लेकिन इस मामले की परिस्थितियों ने समाज में गंभीर प्रश्न उठाए हैं।
उन्होंने आगे कहा कि स्वामी जी ने पहले महाकुंभ मेले में हुई भगदड़ के संदर्भ में राज्य सरकार की व्यवस्थाओं पर सवाल उठाए थे। इसके बाद उन्हें माघ मेले में स्नान से रोके जाने और उनके साथ आए बटुकों के साथ दुर्व्यवहार की घटनाओं का सामना करना पड़ा, जिनकी व्यापक आलोचना हुई। ऐसे में वर्तमान आपराधिक कार्रवाई का समय स्वाभाविक रूप से चर्चा का विषय बन गया है।
यह भी महत्वपूर्ण है कि प्राथमिकी दर्ज करने वाले व्यक्तियों की पृष्ठभूमि और संभावित प्रेरणाओं का निष्पक्ष परीक्षण किया जाए। यदि यह मामला पूरी तरह से विधिसम्मत है, तो पारदर्शी जांच से सत्य सामने आएगा। लेकिन यदि इसके पीछे राजनीतिक दबाव या दुर्भावना है, तो उसका समाधान भी आवश्यक है। ऐसी स्थिति में स्वतंत्र या केंद्रीय एजेंसी द्वारा जांच ही जनविश्वास को मजबूत कर सकती है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संप्रदायों को अपने मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार प्रदान करते हैं। शंकराचार्य का पद सनातन परंपरा में सर्वोच्च आध्यात्मिक पदों में से एक है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी कहा है कि यदि आपराधिक कार्रवाई प्रतिशोधात्मक प्रतीत होती है, तो न्यायिक हस्तक्षेप उचित है।
स्पष्ट है कि असहमति या आलोचना को दंडात्मक शक्ति से दबाया नहीं जा सकता। इस संदर्भ में यह आवश्यक है कि आपराधिक प्रक्रिया निष्पक्ष और स्वतंत्र हो, ताकि धार्मिक पद की गरिमा को राजनीतिक विवादों से अलग रखा जा सके।
प्रधानमंत्री जी, यदि किसी शीर्ष धर्माचार्य के खिलाफ परिस्थितियों से यह धारणा बनती है कि शासन और आध्यात्मिक परंपरा के बीच टकराव है, तो इससे धार्मिक समाज में असंतोष उत्पन्न हो सकता है। ऐसी किसी भी आशंका का समाधान समय पर करना आवश्यक है।
भारतीय समाज में यह सवाल उठ रहा है कि क्या उत्तर प्रदेश सरकार की कार्रवाइयाँ अनावश्यक कठोरता या प्रतिशोध से प्रेरित हैं। यदि ऐसा है, तो इससे न केवल राज्य की छवि प्रभावित होती है, बल्कि केंद्र सरकार की क्षमता पर भी सवाल उठता है। ऐसी धारणा का समाधान करना अत्यंत आवश्यक है। यह मामला केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि आस्था, संवैधानिक अधिकारों और शासन की निष्पक्षता से जुड़ा है।