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कांग्रेस पार्टी में अध्यक्ष बदलने का नया ट्रेंड

कांग्रेस पार्टी ने चुनावों के नजदीक आते ही अध्यक्ष बदलने की एक नई परंपरा शुरू कर दी है। यह बदलाव विभिन्न राज्यों में देखने को मिल रहा है, जिससे पार्टी के नेता भी मजाक करने लगे हैं। पंजाब और उत्तर प्रदेश में हाल के बदलावों के साथ-साथ बिहार में भी इसी तरह की रणनीति अपनाई गई थी। जानें इस बदलाव के पीछे की वजह और इसका पार्टी पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।
 

कांग्रेस का अध्यक्ष बदलने का चलन

कांग्रेस पार्टी ने चुनावों के नजदीक आते ही अध्यक्ष बदलने की एक नई परंपरा शुरू कर दी है। यह बदलाव विभिन्न राज्यों में देखा जा रहा है, जिससे पार्टी के नेता भी मजाक करने लगे हैं। जब एक नेता से पत्रकारों ने प्रदेश अध्यक्ष के बदलाव के बारे में पूछा, तो उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि चुनावों के नजदीक आने का इंतजार करें। यह एक दिलचस्प रणनीति है, जिसमें चार या पांच साल तक एक ही नेता को अध्यक्ष बनाए रखने के बाद चुनाव से ठीक पहले उन्हें बदल दिया जाता है। उदाहरण के लिए, पंजाब में अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को साढ़े चार साल तक अध्यक्ष बनाए रखा गया, लेकिन चुनाव से चार महीने पहले उन्हें हटा कर परगट सिंह को अध्यक्ष बना दिया गया।


यह बदलाव इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि दो महीने पहले तक भूपेश बघेल ने स्पष्ट रूप से कहा था कि राजा वड़िंग अध्यक्ष बने रहेंगे। लेकिन अंततः बघेल और वड़िंग दोनों को बदल दिया गया। इसके बाद उत्तर प्रदेश में भी अध्यक्ष का बदलाव हुआ, जहां अजय राय को तीन साल तक अध्यक्ष बनाए रखा गया, लेकिन चुनाव से पहले आराधना मिश्रा को अध्यक्ष बना दिया गया।


पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान भी इसी तरह का बदलाव देखा गया था। कांग्रेस ने पहले मोहन प्रकाश को प्रभारी पद से हटाया और फिर अखिलेश प्रसाद सिंह को अध्यक्ष पद से। इसके बाद कृष्णा अल्लावरू को बिहार का प्रभारी बनाया गया और राजेश राम को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। इस बदलाव के बाद सीट बंटवारे में काफी समस्याएं आईं। अंततः कांग्रेस को बिहार में केवल पांच सीटें मिलीं।


झारखंड में भी इसी तरह का बदलाव हुआ था, जहां चुनाव से तीन महीने पहले राजेश ठाकुर को हटाकर केशव महतो कमलेश को अध्यक्ष बनाया गया। हालांकि झारखंड में कांग्रेस ने सर्वाइव कर लिया, लेकिन बिहार की स्थिति बिगड़ गई। अब देखना यह है कि पंजाब और यूपी में कांग्रेस का क्या हाल होता है।