☰
×

काशी में अंतिम संस्कार के लिए किराए पर कंधे: बदलते रिश्तों की कहानी

काशी में एक रिटायर्ड अधिकारी की पत्नी के निधन के बाद, जब रिश्तेदारों ने मदद नहीं की, तो चार अनजान युवकों ने उनकी अंतिम यात्रा को पूरा किया। यह घटना आज के समय में रिश्तों की खोखलापन को उजागर करती है। इस नई व्यवस्था ने बुजुर्गों के लिए एक सहारा बनकर समाज में एक महत्वपूर्ण बदलाव लाया है। जानें कैसे ये युवक अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी लेते हैं और इसे एक सेवा का रूप देते हैं।
 

काशी में एक नई सामाजिक वास्तविकता

वाराणसी: मोक्ष की नगरी काशी में एक ऐसी घटना सामने आई है, जो आज के समय में रिश्तों की खोखलापन को उजागर करती है। एक रिटायर्ड सरकारी अधिकारी, जिनकी पत्नी का निधन हो गया, को अपने प्रियजन के शव को महाश्मशान घाट तक ले जाने के लिए चार लोगों का सहारा नहीं मिला। रिश्तेदारों की अनदेखी के बाद, अंततः चार अनजान युवकों ने उस दुखी पति की पत्नी की अंतिम यात्रा को पूरा किया।


अकेलेपन का अहसास

रिश्तों की बेरुखी
सिन्हा साहब, जो अपनी नौकरी के दौरान उच्च पद पर रहे, एकांतप्रिय थे। पत्नी के निधन के आठ घंटे बाद भी कोई रिश्तेदार उनके पास नहीं आया। जब उन्होंने फोन किया, तो सभी ने केवल औपचारिकता निभाई। इस स्थिति में, वह सड़क किनारे खड़े होकर चार कंधों के लिए रो रहे थे।


किराए के कंधों की मदद

अर्थी का सफर
जब सिन्हा साहब लाचार खड़े थे, चार स्थानीय युवकों ने उनकी मदद की। बातचीत के बाद, उन्होंने मृतका की अर्थी को अपने कंधों पर उठाया। इस घटना ने सिन्हा साहब को थोड़ी राहत दी, क्योंकि उनकी पत्नी की अंतिम यात्रा अब लावारिस नहीं रहेगी। जैसे ही यात्रा शुरू हुई, एक वीआईपी काफिला वहां से गुजरा, जिससे उन्हें यह एहसास हुआ कि पद के जाने के बाद लोग कितनी जल्दी भुला देते हैं।


नई व्यवस्था का उदय

संवेदनाओं का पेशा
काशी में यह नई व्यवस्था बुजुर्गों के लिए एक सहारा बन गई है। ये युवक अंतिम संस्कार की पूरी जिम्मेदारी लेते हैं और सम्मानपूर्वक शव को मुखाग्नि स्थल तक पहुंचाते हैं। चाहे इसे बाजारवाद का असर कहें या रिश्तों की टूटन, लेकिन यह सच है कि इस व्यवस्था के चलते किसी की अंतिम यात्रा अधूरी नहीं रहती।


युवकों की सोच

इंसानियत का साथ
इस पेशे से जुड़े युवकों का कहना है कि उन्होंने शुरुआत में पैसे के लिए यह काम किया, लेकिन अब यह सेवा का भाव बन गया है। युवा सुभाष सोनी बताते हैं कि जब परिवार अंतिम समय में लाचार होता है, तो उन्हें सहारे की जरूरत होती है। मनीष पाल का कहना है कि आज की डिजिटल दुनिया में लोग अपने रिश्तों से कट चुके हैं, ऐसे में उनकी यह सेवा समाज की एक बड़ी जरूरत बन गई है।