केजरीवाल की टकराव की राजनीति में बदलाव: दिल्ली में मेयर चुनाव से दूरी
केजरीवाल की नई रणनीति
अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक शैली में टकराव की राजनीति एक प्रमुख तत्व रही है। उन्होंने अपने इस दृष्टिकोण से आम आदमी पार्टी को तेजी से राष्ट्रीय स्तर पर फैलाया और इसे एक प्रमुख पार्टी बना दिया। हालाँकि, अब ऐसा प्रतीत होता है कि वे इस टकराव की राजनीति से पीछे हट रहे हैं। इसका स्पष्ट उदाहरण दिल्ली में देखने को मिला है।
अरविंद केजरीवाल ने लगातार दूसरी बार दिल्ली में मेयर पद के लिए चुनाव न लड़ने का निर्णय लिया है। उनकी पार्टी ने इस पद के लिए कोई उम्मीदवार नहीं उतारा। जबकि कांग्रेस, जिसके पास केवल आठ पार्षद हैं, ने चुनाव में अपने उम्मीदवार को पेश किया। दूसरी ओर, दिल्ली नगर निगम में आम आदमी पार्टी दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है, फिर भी उसने चुनाव में कोई उम्मीदवार नहीं दिया।
हालांकि, परिणाम सभी को ज्ञात है कि भाजपा का ही मेयर चुना जाएगा। लेकिन आम आदमी पार्टी ने चुनाव में भाग न लेकर यह संकेत दिया है कि वह भाजपा को स्वतंत्रता दे रही है। पार्टी के नेताओं का कहना है कि वे भाजपा को किसी भी प्रकार की आलोचना का अवसर नहीं देना चाहते हैं।
दिल्ली में अब एक डबल नहीं, बल्कि ट्रिपल इंजन की सरकार है। केंद्र, राज्य और नगर निगम सभी पर भाजपा का नियंत्रण है। इसके बाद भाजपा के पास किसी भी काम के न होने का कोई बहाना नहीं रह जाएगा। उपराज्यपाल, मुख्यमंत्री और मेयर सभी भाजपा के हैं। इसलिए अब दिल्ली में सभी कार्यों को सुचारू रूप से होना चाहिए।
आम आदमी पार्टी यह संदेश भी दिल्ली की जनता तक पहुंचा रही है कि सभी जिम्मेदारियाँ भाजपा के हाथ में हैं। आस-पास के सभी राज्यों में भी भाजपा की सरकार है। यदि इसके बावजूद यमुना साफ नहीं होती, दिल्लीवासियों को साफ पानी और हवा नहीं मिलती, नालों की सफाई नहीं होती, कूड़े का ढेर नहीं हटता, और कानून व्यवस्था में सुधार नहीं होता, तो भाजपा के पास कोई तर्क नहीं बचेगा। चाहे वह कितना भी प्रचार करे, दिल्ली के लोगों को समझाना कठिन होगा। देखते हैं कि केजरीवाल की यह रणनीति भाजपा को उजागर करने में कितनी सफल होती है।