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केरल में भाषा विवाद: कांग्रेस की दुविधा और मलयालम का महत्व

केरल में विधानसभा चुनावों से पहले एक नया भाषाई विवाद उभरा है, जिसमें मलयालम को प्राथमिकता देने का प्रस्ताव है। कांग्रेस पार्टी इस मुद्दे पर असमंजस में है, क्योंकि कर्नाटक से सटी सीमा पर कन्नड़ बोलने वाले लोगों की संख्या अधिक है। जानें इस विवाद के पीछे की राजनीति और कांग्रेस की स्थिति के बारे में।
 

भाषाई टकराव का नया मोड़

उत्तर भारत के निवासियों के लिए दक्षिण भारत एक भौगोलिक क्षेत्र के रूप में जाना जाता है, जहां वे आमतौर पर तमिल, मलयालम, कन्नड़ और तेलुगू भाषाओं के बीच भेद नहीं करते। हिंदी और तमिल या हिंदी और कन्नड़ के बीच विवाद को अक्सर उत्तर-दक्षिण भारत के संघर्ष के रूप में देखा जाता है। हाल ही में, केरल में विधानसभा चुनावों से पहले एक नया भाषाई विवाद उभरा है। यह विवाद हिंदी बनाम मलयालम नहीं, बल्कि मलयालम बनाम कन्नड़ है, जिसमें कांग्रेस पार्टी की स्थिति काफी जटिल हो गई है।


राज्य सरकार ने मलयालम भाषा बिल लाने का निर्णय लिया है, जिसके तहत मलयालम को केरल की पहली और आधिकारिक भाषा बनाया जाएगा। यह कदम केंद्र सरकार द्वारा सरकारी कार्यों में हिंदी को थोपने के जवाब में उठाया जा रहा है। लेकिन कांग्रेस इस मुद्दे पर असमंजस में है। पार्टी न तो इस बिल का समर्थन कर रही है और न ही इसका विरोध कर पा रही है। इसका मुख्य कारण यह है कि कर्नाटक से सटी सीमा पर बड़ी संख्या में कन्नड़ बोलने वाले लोग निवास करते हैं।


यदि कांग्रेस मलयालम की प्राथमिकता वाले बिल का समर्थन करती है, तो कन्नड़ बोलने वाले लोग नाराज हो सकते हैं, और कर्नाटक में भाजपा इसे राजनीतिक मुद्दा बना सकती है। कर्नाटक में विधानसभा चुनाव दो साल बाद होने वाले हैं, इसलिए कांग्रेस ने चुप्पी साध रखी है। चुनावों से पहले लेफ्ट सरकार ने यह बिल पेश करके कांग्रेस को एक कठिन स्थिति में डाल दिया है।