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केरल विधानसभा चुनाव: सीपीएम के लिए चुनौतीपूर्ण स्थिति

केरल में विधानसभा चुनावों की तैयारी चल रही है, जहां सीपीएम के लिए स्थिति चुनौतीपूर्ण बनती जा रही है। पिछले 10 वर्षों से सत्ता में रहने के बावजूद, पार्टी को एंटी इन्कम्बैंसी का सामना करना पड़ रहा है। हाल ही में पार्टी के प्रमुख नेताओं का विद्रोह भी चिंता का विषय है। जानें कैसे ये घटनाक्रम सीपीएम की चुनावी संभावनाओं को प्रभावित कर सकते हैं।
 

केरल में चुनावी माहौल

अगले महीने केरल में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। सीपीएम के नेतृत्व में चलने वाला लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) के लिए यह मुकाबला बेहद कठिन साबित हो सकता है, क्योंकि वह पिछले 10 वर्षों से सत्ता में है। एंटी इन्कम्बैंसी का माहौल बन चुका है, और लोकसभा चुनाव के बाद नगर निकाय चुनावों में पार्टी को भारी हार का सामना करना पड़ा है। पिछले चुनाव में सत्ता बदलने की परंपरा टूटी थी, जब लेफ्ट ने लगातार दूसरी बार जीत हासिल की थी। लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं।


सीपीएम के भीतर रैंक एंड फाइल में असंतोष बढ़ता जा रहा है। मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन की कट्टर हिंदुवादी नेताओं के साथ नजदीकी भी पार्टी में नाराजगी का कारण बन रही है, जिससे वोटरों में भी असंतोष देखा जा रहा है।


सीपीएम में विद्रोह

इस बीच, सीपीएम के एक प्रमुख नेता जी सुधाकरण ने पार्टी छोड़ने का निर्णय लिया है। वे अलापुझा क्षेत्र के प्रमुख नेता रहे हैं और अम्बलापुझा सीट से दो बार विधायक रह चुके हैं। सुधाकरण पिछले छह दशकों से सीपीएम से जुड़े थे। उनके जाने से पहले, पीवी अनवर ने भी एलडीएफ का साथ छोड़ दिया था। अनवर भी दो बार के निर्दलीय विधायक थे, जिन्हें सीपीएम का समर्थन प्राप्त था, और अब वे तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं।


इस स्थिति में, यदि अलापुझा जैसे मजबूत गढ़ में सीपीएम को चुनौती मिल रही है, तो इस बार की चुनावी लड़ाई पिछले मुकाबले की तुलना में कहीं अधिक कठिन हो सकती है।