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क्या टीएमसी में ममता बनर्जी का भविष्य खतरे में है? बागी सांसदों की गतिविधियों ने बढ़ाई चिंता

टीएमसी की राजनीति में ममता बनर्जी के लिए संकट के बादल छा गए हैं। पार्टी के भीतर चल रहे अंतर्विरोधों और बागी सांसदों की गतिविधियों ने उनकी स्थिति को कमजोर कर दिया है। हाल ही में सुखेंदु शेखर ने पार्टी और सांसद पद से इस्तीफा दिया, जिससे पार्टी में और भी अटकलें लगाई जा रही हैं। जानें इस घटनाक्रम का पूरा विवरण और ममता बनर्जी की राजनीतिक स्थिति पर इसका प्रभाव।
 

टीएमसी की स्थिति पर संकट के बादल


नई दिल्ली: वर्तमान में, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की राजनीतिक स्थिति अत्यंत नाजुक है। हाल ही में बंगाल चुनाव में मिली हार के बाद, पार्टी की नेता ममता बनर्जी के लिए चुनौतियाँ बढ़ती जा रही हैं। पार्टी के भीतर चल रहे अंतर्विरोधों और कलह ने इसे टूटने के कगार पर ला खड़ा किया है। विधायकों का बागी रुख अपनाना और सांसदों का बीजेपी नेताओं से मिलना इस स्थिति को और गंभीर बना रहा है।


बागी सांसदों की बैठक

पार्टी के 14 सांसदों ने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के साथ बीजेपी नेता भूपेंद्र यादव के निवास पर बैठक की। इस बैठक में पूर्व त्रिपुरा सीएम बिप्लव देब भी शामिल थे। सूत्रों के अनुसार, टीएमसी के 5 बागी सांसद सोमवार सुबह से ही भूपेंद्र यादव के घर पर मौजूद थे। दोपहर 1 बजे के बाद शुभेंदु अधिकारी भी वहां पहुंचे। इस बीच, टीएमसी से इस्तीफा देने वाले सुखेंदु शेखर से मिलने के लिए पार्टी के 5 सांसद दिल्ली में पहुंचे।


सुखेंदु शेखर का इस्तीफा

राज्य सभा सांसद सुखेंदु शेखर ने हाल ही में पार्टी और सांसद पद से इस्तीफा दिया है। उनके इस्तीफे के बाद टीएमसी के सांसदों के बीच कई अटकलें लगाई जा रही हैं। ममता बनर्जी की पकड़ विधायकों पर कमजोर पड़ने के कारण पार्टी के संसदीय खेमे को भी झटका लगा है।


ऋतब्रत बनर्जी की प्रतिक्रिया


बागी विधायक और नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी ने कहा कि उन्होंने कई विधायकों से बातचीत की है। उन्होंने सुखेंदु के इस्तीफे पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह केवल सुखेंदु की बात नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक मुद्दा है।


दिल्ली में ममता बनर्जी की मुलाकात

दिल्ली में, जहां टीएमसी के बागी विधायक बीजेपी नेताओं से मिल रहे हैं, वहीं ममता बनर्जी ने इंडिया ब्लॉक गठबंधन की बैठक में सोनिया गांधी से भी मुलाकात की। लोकसभा में टीएमसी के 28 सांसद हैं, और किसी भी संवैधानिक विभाजन के लिए कम से कम 19 सांसदों का एक समूह बनाना आवश्यक है।