क्या न्यायपालिका ने अपनी प्रतिष्ठा को बचा लिया है?
न्यायपालिका की प्रतिष्ठा पर सवाल
क्या अब यह कहा जा सकता है कि न्यायपालिका ने अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा कर ली है? आखिर न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की धारणा इतनी बढ़ गई है कि अब यह पाठ्य-पुस्तकों में भी शामिल होने लगी है?
एनसीईआरटी की आठवीं कक्षा की किताब में न्यायपालिका की चुनौतियों का उल्लेख करने से बार एसोसिएशन और प्रधान न्यायाधीश दोनों ही चिंतित हैं। इस पुस्तक में जिन समस्याओं का जिक्र किया गया है, उनमें लंबित मुकदमों की संख्या, न्यायाधीशों की कमी, और न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के आरोप शामिल हैं। इस पर प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्य कांत ने स्वतः संज्ञान लेते हुए कहा कि उनकी जिम्मेदारी है कि वे संस्था की प्रतिष्ठा की रक्षा करें।
बार एसोसिएशन ने यह भी सवाल उठाया कि एनसीईआरटी ने संसद में आपराधिक छवि वाले व्यक्तियों और अन्य क्षेत्रों में भ्रष्टाचार का उल्लेख क्यों नहीं किया? चूंकि न्यायपालिका के पास अवमानना कार्यवाही की शक्ति है, इसलिए प्रधान न्यायाधीश की टिप्पणियों का तात्कालिक प्रभाव पड़ा। एनसीईआरटी ने विवादित हिस्से को हटाने का निर्णय लिया और उसकी बिक्री रोक दी। लेकिन क्या न्यायपालिका से जुड़े लोग अब यह कह सकते हैं कि उन्होंने अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा कर ली है?
क्या यह बेहतर नहीं होता कि वे यह सवाल उठाते कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की धारणा इतनी बढ़ क्यों गई है कि यह पाठ्य-पुस्तकों में शामिल हो गई? क्या यह अधिक सकारात्मक दृष्टिकोण नहीं होता कि वे इस धारणा की जड़ तक पहुंचें और उसका समाधान करें? यह सच है कि सभी जगहों पर खामियां होनी चाहिए। लेकिन एक जगह की खामी से दूसरी जगहों पर मौजूद बुराइयों को सही ठहराने का तर्क नहीं बनता। सार्वजनिक लाभ के दृष्टिकोण से कहा जाता है कि पारदर्शिता सुधार का पहला कदम है। इसलिए, संदेह, आरोप, या धारणाओं को दबाने के बजाय, तथ्यों को सामने लाना, उन पर चर्चा करना और समस्याओं का समाधान खोजना सही दृष्टिकोण होगा। इससे विभिन्न संस्थाओं और पूरे राज्य तंत्र की प्रतिष्ठा सुरक्षित रह सकेगी।