क्या भाजपा जनभावना की अनदेखी कर चुनाव जीत रही है?
भाजपा की चुनावी रणनीति और जनभावना
क्या भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इतनी मजबूत हो गई है कि उसे चुनाव जीतने के लिए जनभावना का ध्यान रखने की आवश्यकता नहीं है? क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह का नेतृत्व इस स्तर तक पहुंच गया है कि वे विपरीत जनभावना के बावजूद भाजपा को चुनावी सफलता दिला सकते हैं? यह सवाल इसलिए उठता है क्योंकि भाजपा कई बार जनभावना के खिलाफ कार्य करती नजर आती है। ऐसे मुद्दों पर भी, जिन पर भाजपा ने स्वयं जनभावना का निर्माण किया है। नागरिक इस स्थिति को समझते हैं और सार्वजनिक विमर्श में इसकी चर्चा होती है। लोग सवाल उठाते हैं, लेकिन मतदान के समय उनकी प्राथमिकताएं बदल जाती हैं और वे भाजपा को वोट देते हैं। क्या यह स्टॉकहोम सिंड्रोम है या मोदी और शाह ने कुछ ऐसे मुद्दे लोगों के अवचेतन में स्थापित कर दिए हैं जो मतदान के समय उनके मनोविज्ञान को प्रभावित करते हैं?
भ्रष्टाचार का मुद्दा इस संदर्भ में एक प्रमुख उदाहरण है। भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जनमत तैयार किया था और नारा दिया था, 'न खाऊंगा न खाने दूंगा।' लेकिन भाजपा भ्रष्टाचार के आरोपियों को पार्टी में शामिल कर उन्हें उच्च पद पर बैठाती है। महाराष्ट्र में अजित पवार पर 70 हजार करोड़ रुपये के सिंचाई घोटाले का आरोप था, लेकिन वे भाजपा में शामिल हो गए और उपमुख्यमंत्री बने। यह कहानी कई राज्यों में दोहराई गई है।
भ्रष्टाचार के अलावा, भाजपा ने वंशवाद के खिलाफ भी जनभावना का निर्माण किया। परिवारवाद को लोकतंत्र के लिए खतरा बताया, लेकिन विभिन्न राज्यों में परिवारवादी पार्टियों को अपने साथ जोड़ा और उन्हें मंत्री बनाया।
महंगाई का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। 2014 में मोदी ने 'बहुत हुई महंगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार' का नारा दिया था, लेकिन सरकार में आने के बाद महंगाई बढ़ी है। पेट्रोल की कीमतें 100 रुपये के पार जा चुकी हैं।
प्रधानमंत्री ने 'परीक्षा पर चर्चा' की, लेकिन नीट यूजी पेपर लीक और सीबीएसई की गड़बड़ियों के कारण लाखों छात्र परेशान हैं। इसके बावजूद भाजपा और सरकार को इसकी परवाह नहीं है।
इस प्रकार, भ्रष्टाचार, परिवारवाद, महंगाई और रोजगार के मुद्दे पर जनभावना सरकार के खिलाफ है। फिर भी भाजपा चुनाव जीत रही है, जिसका मतलब है कि सामान्य दिनों में जनभावना और मतदान के दिन की प्राथमिकताएं समान नहीं हैं।