क्या भारत युद्ध के संकट से निपटने के लिए तैयार है? पीएम मोदी की CCS बैठक में उठे गंभीर मुद्दे
नई दिल्ली में सुरक्षा मामलों की बैठक
नई दिल्ली : पश्चिम एशिया में चल रहे गंभीर संघर्ष और सैन्य गतिविधियों ने वैश्विक चिंता को बढ़ा दिया है। अमेरिका और इजरायल के हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद स्थिति और भी बिगड़ गई है। इस गंभीर परिदृश्य को देखते हुए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली लौटते ही सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति (CCS) की एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई है। भारत सरकार अब युद्ध के संभावित प्रभावों और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर पूरी तरह से सतर्क है।
PM मोदी की CCS बैठक का महत्व
पीएम मोदी रविवार रात लगभग 9:30 बजे दिल्ली लौटते हैं, जहां वे गुजरात, राजस्थान, पुडुचेरी और तमिलनाडु के दो दिवसीय दौरे के बाद उच्चस्तरीय समीक्षा करेंगे। इस बैठक में विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी शामिल होंगे। सरकार का मुख्य उद्देश्य युद्ध की गंभीरता का सही आकलन करना और भारत के हितों की रक्षा के लिए त्वरित कदम उठाना है। तेहरान में मची हलचल के बाद भारत पूरी सतर्कता बरत रहा है।
भारतीय नागरिकों की सुरक्षा पर ध्यान
खाड़ी देशों, ईरान और इजरायल में हजारों भारतीय नागरिक कार्यरत हैं। यदि युद्ध की स्थिति बढ़ती है, तो इनकी जान को गंभीर खतरा हो सकता है। मोदी सरकार के लिए इनकी सुरक्षित वापसी अब सर्वोच्च प्राथमिकता बन गई है। विदेश मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय मिलकर एक बड़े रेस्क्यू प्लान पर काम कर रहे हैं। भारत ने पहले भी 'ऑपरेशन गंगा' और 'ऑपरेशन अजय' जैसे सफल मिशन चलाकर अपनी ताकत दिखाई है। अब फिर से ऐसी ही तैयारियां की जा रही हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य का संकट
एक बड़ी चिंता होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर है। रिपोर्टों के अनुसार, ईरानी अधिकारियों ने युद्ध के चलते इस समुद्री मार्ग को बंद करने का संकेत दिया है। यह मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति की लाइफलाइन माना जाता है। भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है, जिसका एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से आता है। यदि यह मार्ग लंबे समय तक बंद रहा, तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर गंभीर संकट आ सकता है।
भारत की अर्थव्यवस्था पर टकराव का प्रभाव
टकराव का असर भारत पर पड़ने की आशंका
ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच बढ़ते टकराव का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ने की आशंका है। यदि खाड़ी देशों से कच्चे तेल की सप्लाई बाधित होती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में बड़ा उछाल आएगा। इससे भारत में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ सकते हैं, जिसका सीधा परिणाम आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि और महंगाई के रूप में सामने आएगा। सरकार अब तेल के वैकल्पिक स्रोतों और कीमतों को स्थिर रखने के उपायों पर गंभीरता से विचार कर रही है।
भारत की कूटनीतिक सक्रियता
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के रुख पर भी चर्चा
युद्ध की इस विकट स्थिति में भारत अपनी कूटनीतिक सक्रियता भी बढ़ा रहा है। CCS की बैठक में न केवल सुरक्षा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के रुख पर भी चर्चा होगी। भारत शांति की अपील कर रहा है, लेकिन युद्ध बढ़ने की स्थिति में वह अपने नागरिकों और आर्थिक हितों से कोई समझौता नहीं करेगा। प्रधानमंत्री मोदी खुद इस पूरी स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं ताकि भारत को इस वैश्विक संकट से सुरक्षित बाहर निकाला जा सके और शांति बहाल की जा सके।