क्षेत्रीय दलों का भविष्य: क्या वे 2029 तक अस्तित्व में रहेंगे?
क्षेत्रीय दलों की चुनौतियाँ
हालिया चुनावों ने क्षेत्रीय दलों के भविष्य पर सवाल खड़ा कर दिया है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की हार, तमिलनाडु में स्टालिन की असफलता और केरल में वामपंथ की घटती ताकत ने अन्य क्षेत्रीय दलों को भी चिंतित कर दिया है। क्या ये दल 2029 तक खत्म हो जाएंगे? यह एक गंभीर प्रश्न है।
यदि हम इतिहास पर नजर डालें, तो स्थिति कुछ और ही बयां करती है।
क्षेत्रीय दलों ने भारत को जोड़ने के बजाय उसे बांटने का काम किया है। जातियों को राजनीतिक वोट बैंक में बदल दिया गया है, जिससे शासन भी इसी दायरे में सिमट गया। सामाजिक ढांचे में बदलाव की बजाय, पुराने ढांचे को नए तरीके से स्थापित किया गया। ऊंच-नीच की समस्या खत्म नहीं हुई, बल्कि उसका स्वरूप बदल गया।
1990 के दशक का मंडल आंदोलन एक बड़े सामाजिक बदलाव का वादा लेकर आया था, लेकिन इसके परिणामस्वरूप केवल सत्ता का स्थानांतरण हुआ। पिछड़े वर्गों का एक नया अभिजात्य वर्ग सत्ता में आया, जिसने आरक्षण को चुनावी राजनीति का औजार बना दिया। योग्यता को संदेह का विषय बना दिया गया।
दलितों और कमजोर वर्गों की रक्षा के लिए बनाए गए कानून भी अब राजनीतिक हथियार बन गए हैं। इनका गलत इस्तेमाल होने से असली पीड़ित की विश्वसनीयता कमजोर हुई है। हर राजनीतिक नारेबाजी ने सामाजिक हिंसा को हल्का कर दिया है।
जातीय नेता मंत्री पद और सत्ता की सुविधाएं लेते रहे, जबकि जिनके नाम पर राजनीति हुई, वे वहीं के वहीं रह गए। झुग्गी-झोपड़ियों में जीवन और चुनावों में वही पुराने वादे। धीरे-धीरे जाति राजनीति की मुद्रा बन गई।
इस विफलता का परिणाम स्पष्ट है। बीमारू राज्यों में गरीबी केवल आर्थिक स्थिति नहीं, बल्कि जातीय सामंतवाद की राजनीतिक परियोजना बन गई है।
दक्षिण भारत में भी यही कहानी थोड़ी बेहतर तरीके से दिखाई दी। तमिलनाडु के द्रविड़ आंदोलन ने ब्राह्मण वर्चस्व को चुनौती दी, लेकिन सुधार धीरे-धीरे परिवारवादी विरासत में बदल गया।
पश्चिम बंगाल में वाम शासन के दौरान उद्योगों की हिस्सेदारी में भारी गिरावट आई। ममता बनर्जी ने लाल झंडों की जगह अपना जनवादी मॉडल पेश किया, लेकिन बदलाव का कोई ठोस परिणाम नहीं आया।
पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत में राजनीतिक शोषण और अलगाव की स्थिति बनी रही। पश्चिम भारत में भी संपन्नता असमान तरीके से आई।
इन सबके बीच, भारत कुल मिलाकर पिछड़ा ही बना रहा। यह केवल क्षेत्रीय राजनीति के कारण नहीं, बल्कि काफी हद तक उसी के कारण।
बुद्धिजीवियों ने अल्पसंख्यक अधिकारों का समर्थन किया, लेकिन सामाजिक गतिशीलता में कोई सुधार नहीं हुआ।
जातीय राजनीति की इस मशीनरी में क्षेत्रीय क्षत्रप दिल्ली की सत्ता में हिस्सेदारी लेते रहे, जबकि जिन समुदायों के नाम पर राजनीति होती रही, वे पीछे छूटते गए।
पिछले पचास वर्षों में ऐसी राजनीति बनी जो असमानता का वर्णन तो करती थी, लेकिन उसे तोड़ने का रास्ता नहीं बना सकी।
भाजपा ने इस खालीपन में प्रवेश किया है, लेकिन वह जाति की राजनीति को अपने विरोधियों से अधिक चतुराई से साधती है।
क्षेत्रीय दल अब केवल चुनावी संकट नहीं, बल्कि गहरे अस्तित्व संकट का सामना कर रहे हैं।
सवाल यह है कि जो नई व्यवस्था पुरानी व्यवस्था की जगह ले रही है, क्या वह अपने वादों को पूरा कर सकेगी? भारत को जातीय राजनीति के दायरे से बाहर निकलना होगा। तभी 'नया भारत' केवल नारा नहीं, वास्तविकता बन सकेगा।