गाजा शांति बोर्ड में भारत की भागीदारी पर विचार
गाजा शांति बोर्ड की चुनौतियाँ
गाजा में स्थिरता लाने के लिए कार्यक्षेत्र को सीमित रखने के बजाय, बोर्ड को व्यापक अधिकार दिए गए हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा निर्धारित दायरा इससे कहीं अधिक विस्तृत प्रतीत होता है।
भारत के लिए गाजा शांति बोर्ड में शामिल होने का आमंत्रण स्वीकार करना आसान नहीं होगा। इस बोर्ड से कई जटिलताएँ जुड़ी हुई हैं, और इसमें कई जोखिम भी शामिल हैं। यही कारण है कि डोनाल्ड ट्रंप के करीबी कुछ नेताओं के अलावा, किसी भी बड़े देश ने इस प्रस्ताव के प्रति उत्साह नहीं दिखाया है। फ्रांस ने तो इस आमंत्रण को अस्वीकार करने के संकेत दिए हैं। ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर को बोर्ड में महत्वपूर्ण भूमिका दी गई थी, लेकिन जब उन्हें पता चला कि इसके लिए एक बिलियन डॉलर का चंदा देना होगा, तो उन्होंने भी बोर्ड से दूरी बनाने का संकेत दिया।
इजराइल ने भी इस योजना का खुलकर विरोध किया है। आपत्तियों की एक लंबी सूची है। सबसे पहले, सभी हितधारकों के साथ बिना व्यापक विचार-विमर्श के, अमेरिकी राष्ट्रपति के कुछ करीबी लोगों ने बोर्ड के कार्यक्षेत्र और गठन की शर्तें तय कर दीं। गाजा में स्थिरता लाने और विकास कार्यों को सुनिश्चित करने के बजाय, इसे व्यापक अधिकार दिए गए हैं। इस प्रकार, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा निर्धारित दायरा इससे कहीं अधिक विस्तृत प्रतीत होता है, और कई हलकों में इसे सुरक्षा परिषद के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
इस तरह, इसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित वैश्विक व्यवस्था के लिए एक चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। निर्णय लेने का अंतिम अधिकार ट्रंप के पास है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इसका ढांचा लोकतांत्रिक नहीं है। वहीं, बोर्ड के सदस्यों के चयन में कोई स्पष्टता नहीं है। भारत को आमंत्रण मिला है, जबकि पाकिस्तान और बांग्लादेश को भी। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत को एक बिलियन डॉलर देकर इस बोर्ड में शामिल होना चाहिए? और क्या इससे भारत के हित सधेंगे? निश्चित रूप से, अमेरिका के साथ बेहतर संबंध भारत के लिए फायदेमंद हैं, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि ट्रंप की हर योजना से जुड़ना भारत के लिए लाभकारी होगा। इसलिए, भारत को इस निर्णय में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।