गुजरात में समान नागरिक संहिता: क्या यह सामाजिक सुधार का एक नया अध्याय है?
गुजरात में UCC का प्रस्ताव
नई दिल्ली: उत्तराखंड के बाद, गुजरात भी समान नागरिक संहिता (UCC) को लागू करने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने विधानसभा में इस विधेयक को पेश किया, जिससे यह मुद्दा फिर से राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया है।
UCC का उद्देश्य
समान नागरिक संहिता का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे व्यक्तिगत मामलों में सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून हो। यह विचार भारतीय राजनीति और समाज में लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। राम मंदिर और धारा 370 जैसे मुद्दों के बाद, UCC भाजपा के प्रमुख एजेंडे में शामिल हो गया है।
महिलाओं के अधिकार और आदिवासी छूट
इस विधेयक को महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जिसमें हलाला और बहुविवाह जैसी प्रथाओं पर रोक लगाने का प्रस्ताव है। समर्थकों का मानना है कि इससे महिलाओं को कानूनी सुरक्षा और समानता का अधिकार मिलेगा।
हालांकि, यह सवाल उठता है कि गुजरात की लगभग 15% आदिवासी जनसंख्या को इस कानून से बाहर क्यों रखा गया है। यदि समानता का उद्देश्य है, तो क्या यह छूट उस सिद्धांत के खिलाफ नहीं जाती?
लिव-इन रिलेशनशिप पर नए नियम
विधेयक में लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीकरण अनिवार्य किया गया है, और नियमों के उल्लंघन पर सजा का प्रावधान भी है। सरकार का तर्क है कि इससे महिलाओं को सुरक्षा मिलेगी और उनके अधिकारों की रक्षा होगी।
हालांकि, आलोचकों का कहना है कि यह प्रावधान निजता के अधिकार में हस्तक्षेप कर सकता है और इसे 'मॉरल पुलिसिंग' के रूप में देखा जा रहा है।
धार्मिक स्वतंत्रता बनाम समान कानून
संविधान का अनुच्छेद 25 नागरिकों को अपने धर्म के अनुसार जीवन जीने की स्वतंत्रता प्रदान करता है। ऐसे में, UCC को लेकर अल्पसंख्यकों के बीच अपनी पहचान को लेकर चिंताएं भी उठ रही हैं। सरकार का कहना है कि यह कानून किसी धर्म के खिलाफ नहीं है, बल्कि नागरिकों के अधिकारों को समान बनाने के लिए है।
चुनावी समय और व्यावहारिक चुनौतियाँ
गुजरात में आगामी चुनावों के संदर्भ में इस विधेयक को राजनीतिक दृष्टिकोण से भी देखा जा रहा है। कुछ लोग इसे उत्तराखंड मॉडल का 'कॉपी-पेस्ट' मानते हैं। सवाल यह भी है कि क्या विभिन्न सामाजिक संरचनाओं वाले राज्यों में एक ही मॉडल समान रूप से प्रभावी हो सकेगा।
समानता बनाम एकरूपता
विशेषज्ञों का मानना है कि समान नागरिक संहिता का विचार प्रगतिशील है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे समाज कितना स्वीकार करता है। चुनौती यह है कि कानून केवल कागजों पर समान न दिखे, बल्कि समाज के हर वर्ग को न्याय और सम्मान दिलाने में सक्षम हो।