चुनाव आयोग की भूमिका: क्या भाजपा विरोधी मतदाताओं को निशाना बनाया जा रहा है?
चुनाव आयोग और भाजपा के रणनीतिक कदम
चुनाव आयोग पर सवाल उठता है कि क्या ज्ञानेश कुमार जैसे अधिकारियों के माध्यम से भाजपा विरोधी मतदाताओं के नामों को हटाने की योजना बनाई जा रही है। वर्तमान में, 13 करोड़ मतदाताओं के नाम पुरानी सूची से हटा दिए गए हैं। इनमें से तीन करोड़ बांग्लादेशियों का मामला संदिग्ध है, जिसमें वास्तविक संख्या केवल तीन लाख है। यह स्थिति दर्शाती है कि यह संख्या भी संदिग्ध है। लेकिन मोदी और शाह पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वे अपने तरीके से आगे बढ़ते रहेंगे, जैसे ट्रंप ने किया।
मोदी-शाह 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए बूथवार वोट प्रबंधन, सीटों का परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे मुद्दों पर अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं। यह वही तरीका है जो ट्रंप और उनके प्रबंधकों ने हाल के मध्यावधि चुनावों से पहले अपनाया था।
अमेरिका में, कट्टरपंथी गोरों और अनुदारवादियों वाले राज्यों में भी ट्रंप के उम्मीदवार हार गए हैं। यह स्थिति भारत में भाजपा के गढ़ों जैसे गुजरात और मध्य प्रदेश में भी देखी जा सकती है।
यह सब कैसे हुआ? ट्रंप की धांधली की मंशा ने अमेरिका में एक नैरेटिव बनाया। अमित शाह भी ज्ञानेश कुमार और एसआईआर के बचाव में मुखर हैं, ठीक उसी तरह जैसे ट्रंप ने चुनाव प्रक्रिया में बदलाव के लिए कानूनी प्रयास किए।
हालांकि, अमेरिकी अदालतों ने अधिकांश याचिकाओं को खारिज कर दिया। राज्यों के चुनाव आयोग भी ट्रंप प्रशासन के प्रभाव में नहीं आए। यही कारण है कि ट्रंप के मनमाने इरादों का सबसे अधिक विरोध उनके अपने गढ़ों में हुआ।
इसलिए, मेरा मानना है कि मोदी सरकार के प्रयासों के बावजूद, युवा और आम लोग मोदी सरकार के खिलाफ वही वितृष्णा महसूस कर रहे हैं, जैसे अमेरिका में ट्रंप के खिलाफ। इससे भारत में भी लोकतंत्र का पुनर्जन्म हो सकता है।