चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन: राजनीतिक दलों का प्रायोजित आंदोलन
चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन का राजनीतिक पहलू
चुनाव आयोग के भीतर कुछ प्रक्रियागत मतभेद थे, जिन्हें उन्होंने स्पष्ट किया और आयोग ने उन्हें सही किया। जब यह जानकारी मीडिया में आई, तो विपक्ष ने इसे अपने लाभ के लिए एक अवसर के रूप में देखा और विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए। यह एक राजनीतिक आंदोलन है, जो विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा प्रायोजित है और इसका उद्देश्य विपक्षी दलों के लाभ के लिए है। आम मतदाता भी इस स्थिति को समझ रहा है।
महात्मा गांधी की जयंती पर, यानी 2 अक्टूबर को, देश के विभिन्न हिस्सों में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन हुए। यह हाल के महीनों में दूसरी बार है जब राजनीतिक दलों और गैर-राजनीतिक संगठनों ने सड़कों पर उतरकर विरोध किया। दिल्ली से लेकर मुंबई तक काफी हलचल हुई। हालांकि, जून और जुलाई में दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए 36 दिन के आंदोलन और गांधी जयंती पर हुए इस आंदोलन में एक महत्वपूर्ण अंतर है।
जंतर मंतर पर 20 जून से 25 जुलाई तक चले आंदोलन का उद्देश्य पेपर लीक से प्रभावित छात्रों का था, जिसमें एक नया संगठन, कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी), शामिल हुआ। इस आंदोलन में लेफ्ट पार्टियों, समाजवादी पार्टी, एनसीपी और शिवसेना के नेता भी शामिल हुए थे। यह आंदोलन छात्रों का था, जिनकी संख्या बहुत बड़ी थी।
2026 की नीट परीक्षा में लगभग 24 लाख छात्रों ने भाग लिया था, जो पेपर लीक और पुनः परीक्षा के कारण प्रभावित हुए थे। उस समय कई अन्य परीक्षाओं में भी गड़बड़ी की खबरें आई थीं, जिससे प्रभावितों की संख्या बढ़ गई थी। इस कारण आंदोलन का आकार भी बड़ा हो गया था। हजारों लोग प्रतिदिन प्रदर्शन में शामिल हो रहे थे और लाखों लोग डिजिटल माध्यम से जुड़े हुए थे।
सरकार ने छात्रों की भावनाओं को समझा और कार्रवाई की। दो बड़े मंत्रियों को भेजकर बातचीत की गई, सोनम वांगचुक का अनशन समाप्त कराया गया और छात्रों की सभी मांगें मानकर आंदोलन समाप्त कराया गया।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए चल रहा वर्तमान आंदोलन छात्रों और युवाओं से भिन्न है। इसमें ऐसे लोग शामिल नहीं हैं, जिनके वोट कट गए हैं। जंतर मंतर पर आंदोलन के दौरान उन छात्रों की तस्वीरें रखी गई थीं, जिन्होंने पेपर लीक के बाद आत्महत्या की थी। इस बार के आंदोलन में प्रभावित लोग कहीं नहीं दिख रहे हैं।
प्रदर्शनकारियों ने उन लोगों को मंच पर नहीं लाया, जिनके नाम मतदाता सूची से काटे गए हैं। यदि यह आंदोलन विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के खिलाफ है, तो इसमें उन लोगों को शामिल होना चाहिए था, जिनके नाम कटे हैं। हालांकि, यह जरूरी नहीं है कि हर बार प्रभावित पक्ष ही आंदोलन करे। कई बार प्रभावित पक्ष ऐसा करने में असमर्थ होते हैं और उनकी लड़ाई सिविल सोसायटी या राजनीतिक दल लड़ते हैं।
दिल्ली में 47 लाख लोगों के नाम कट गए हैं। एसआईआर से पहले दिल्ली में 1.45 करोड़ मतदाता थे, जिनमें से अब केवल 97 लाख ही बचे हैं। यदि एनसीआर के क्षेत्रों को भी शामिल किया जाए, तो नाम कटने वालों की संख्या एक करोड़ के करीब पहुंच जाएगी। यदि इनमें से एक प्रतिशत भी लोग आंदोलन में शामिल होते, तो संख्या एक लाख होती। लेकिन 2 अक्टूबर को दिल्ली के आंदोलन में 10,000 लोग भी नहीं जुटे।
यह स्पष्ट है कि वोट कटने वाले आंदोलन से आम जनता का जुड़ाव नहीं बन रहा है। यह एक राजनीतिक मुद्दा है, जो महंगाई या बेरोजगारी की तरह सार्वभौमिक नहीं है, बल्कि व्यक्तिगत राजनीतिक अधिकार से जुड़ा है। इसलिए इस मुद्दे पर हो रहे आंदोलन में प्रभावितों को शामिल होना चाहिए था, जो नहीं हो रहे हैं। इसका मतलब है कि यह कोई वास्तविक मुद्दा नहीं है, बल्कि राजनीतिक दलों द्वारा गढ़ा गया एक मुद्दा है।
पहले दिन से यह स्पष्ट है कि एसआईआर के खिलाफ आंदोलन स्वंयस्फूर्त नहीं है, बल्कि राजनीतिक दलों द्वारा प्रायोजित है। राहुल गांधी ने पिछले साल जून में बिहार में एसआईआर शुरू होने के बाद इसके खिलाफ 16 दिन तक यात्रा की थी। उन्हें यह समझ में आ गया था कि इससे जनता का जुड़ाव नहीं है।
वास्तविकता यह है कि एसआईआर का मुद्दा आम आदमी का मुद्दा नहीं है। यह राजनीतिक दलों का मुद्दा है, जो अपनी हार का ठीकरा चुनाव आयोग पर फोड़ना चाहते हैं। विपक्षी पार्टियों की हार राजनीतिक कारणों से है। उनकी संगठनात्मक क्षमता कमजोर होने और नेतृत्व की कमी से उनकी हार हो रही है।