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चुनावी राजनीति में संख्या का खेल: बिहार और तमिलनाडु की कहानी

चुनावी राजनीति में संख्या का महत्व अक्सर धोखा देने वाला होता है। बिहार और तमिलनाडु के उदाहरणों के माध्यम से, यह स्पष्ट होता है कि कैसे कम या ज्यादा सीटें नेताओं की शक्ति को प्रभावित कर सकती हैं। बिहार में नीतीश कुमार की स्थिति और तमिलनाडु में कांग्रेस की वापसी की कहानी इस बात का प्रमाण है कि राजनीति में संख्याएं हमेशा सही तस्वीर नहीं पेश करतीं। जानें कैसे कांग्रेस ने 60 साल बाद सरकार में शामिल होने का मौका पाया और क्या यह उसकी वापसी का संकेत है।
 

संख्याओं का प्रभाव

चुनावी राजनीति में अक्सर संख्या एक धोखा देने वाला तत्व साबित होती है। कभी-कभी बड़ी संख्या नेताओं और पार्टियों की शक्ति को नहीं बढ़ाती, जबकि कम संख्या भी उन्हें बहुत मजबूत बना सकती है। बिहार इसका एक स्पष्ट उदाहरण है। 2020 के विधानसभा चुनाव के बाद, नीतीश कुमार केवल 43 सीटों के साथ सबसे शक्तिशाली बने रहे और दोनों प्रमुख पार्टियों को अपने इशारों पर नचाते रहे। लेकिन 2025 के चुनावों के बाद, 85 सीटें जीतने के बावजूद, नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से हटा दिया गया और भाजपा का मुख्यमंत्री बन गया।


तमिलनाडु में संख्या का खेल

तमिलनाडु में भी संख्या की कहानी दोहराई जा रही है। पिछली विधानसभा में कांग्रेस ने 18 सीटें जीती थीं, लेकिन डीएमके ने उसे सरकार में शामिल नहीं किया। डीएमके ने यह सिद्धांत अपनाया कि सरकार केवल उसकी होगी। वास्तव में, दोनों द्रविडियन पार्टियों ने 1967 के बाद से इस नीति का पालन किया है। इसलिए, एमके स्टालिन ने कांग्रेस को सरकार में शामिल नहीं किया। चूंकि डीएमके को अकेले बहुमत मिला था, कांग्रेस कुछ नहीं कर सकी।


कांग्रेस की नई शुरुआत

हालांकि, वर्तमान विधानसभा में हालात ऐसे बने हैं कि केवल पांच सीटें जीतने वाली कांग्रेस को 60 साल बाद सरकार में शामिल होने का अवसर मिला है। कांग्रेस के दो विधायक अब मंत्री बने हैं। एस राजेश कुमार और पी विश्वनाथन ने मंत्री पद की शपथ ली है। राज्य की सबसे बड़ी पार्टी, टीवीके, को 107 सीटें मिली हैं, जो बहुमत से कम हैं। इस स्थिति में कांग्रेस की लॉटरी निकल आई है। अब यह माना जा रहा है कि कांग्रेस की वापसी का दौर शुरू हो सकता है। राज्य में अत्यधिक द्रविडियन राजनीति के बीच, कांग्रेस को अपने लिए एक अवसर दिखाई दे रहा है।