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चुनावों में मुफ्त योजनाओं का नया तरीका: शर्तों के साथ लाभार्थियों की संख्या में कमी

राजनीतिक दलों के लिए मुफ्त योजनाएं चुनाव जीतने का एक महत्वपूर्ण साधन बन गई हैं, लेकिन इन योजनाओं के वित्तीय प्रभाव को कम करने के लिए नई शर्तें जोड़ी जा रही हैं। महाराष्ट्र में 'माझी लड़की बहिन योजना' के लाभार्थियों की संख्या में कमी आई है, जबकि दिल्ली में योजना शुरू करने में देरी हो रही है। जानें कैसे ये शर्तें लाभार्थियों की संख्या को सीमित कर रही हैं और राज्यों की वित्तीय स्थिति पर असर डाल रही हैं।
 

राजनीतिक दलों की मुफ्त योजनाओं का असर


राजनीतिक दलों के लिए मुफ्त योजनाएं चुनाव जीतने का एक प्रभावी उपाय बन गई हैं। चुनाव के दौरान पार्टियां कई वादे करती हैं, लेकिन यह भी सच है कि इन योजनाओं के कारण राज्यों की वित्तीय स्थिति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। वेतन और पेंशन का भुगतान करना कठिन हो रहा है, और विकास योजनाएं भी सीमित हो रही हैं। अब, ऐसा प्रतीत होता है कि पार्टियों ने चुनावी वादों के वित्तीय प्रभाव को कम करने के लिए एक नया तरीका खोज लिया है।


चुनावों के समय की घोषणाओं में अब शर्तें जोड़ी जा रही हैं, जो पहले नहीं बताई जातीं। इन शर्तों के माध्यम से लाभार्थियों की संख्या को सीमित किया जा रहा है, ताकि वित्तीय बोझ को कम किया जा सके।


उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र में भाजपा सरकार के गठन के बाद, 'माझी लड़की बहिन योजना' के लाभार्थियों की संख्या में 90 लाख की कमी आई है। इस योजना के कारण राज्य का वार्षिक खर्च 46 हजार करोड़ रुपये बढ़ गया था, लेकिन अब इसमें 20 हजार करोड़ रुपये की कमी आने की संभावना है।


दिल्ली में भी स्थिति कुछ ऐसी ही है। सरकार ने योजना शुरू नहीं की है, और डेढ़ साल बाद कहा जा रहा है कि अगले महीने योजना शुरू हो सकती है। लेकिन इस बार इतनी शर्तें जोड़ी गई हैं कि लाभार्थी महिलाओं की संख्या केवल 22 लाख रह जाएगी। इस प्रकार, योजनाओं को लागू करने में देरी और लाभार्थियों की संख्या को सीमित करने के लिए नई शर्तें जोड़कर सरकारें वित्तीय प्रभाव को कम करने के उपाय कर रही हैं।