×

टाइगर ग्लोबल की फ्लिपकार्ट बिक्री पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: भारत में कर योग्य पूंजीगत लाभ

सुप्रीम कोर्ट ने टाइगर ग्लोबल द्वारा फ्लिपकार्ट में हिस्सेदारी बेचने से उत्पन्न पूंजीगत लाभ को भारत में कर योग्य ठहराया है। यह निर्णय भारतीय आयकर विभाग के लिए एक महत्वपूर्ण जीत है और विदेशी निवेशकों के लिए कर संधियों के दुरुपयोग के विवाद का समाधान प्रस्तुत करता है। अदालत ने टाइगर ग्लोबल के कर छूट के दावे को खारिज करते हुए कहा कि यह लेन-देन केवल कर बचाने की योजना थी। इस फैसले का दीर्घकालिक प्रभाव विदेशी निवेशकों की भारतीय संपत्तियों में हिस्सेदारी संरचना पर पड़ सकता है।
 

महत्वपूर्ण निर्णय


नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि टाइगर ग्लोबल द्वारा फ्लिपकार्ट में अपनी हिस्सेदारी वॉलमार्ट को 1.6 अरब डॉलर में बेचने से उत्पन्न पूंजीगत लाभ भारत में कर योग्य होगा। यह निर्णय भारतीय आयकर विभाग के लिए एक बड़ी जीत मानी जा रही है और यह विदेशी निवेशकों के लिए कर संधियों के दुरुपयोग से संबंधित विवाद का समाधान प्रस्तुत करता है।


कर संधि लाभ का खारिज होना

सुप्रीम कोर्ट ने टाइगर ग्लोबल के भारत-मॉरीशस कर संधि के तहत कर छूट के दावे को खारिज कर दिया। अदालत ने आयकर विभाग के तर्क को सही ठहराते हुए कहा कि इस लेन-देन की संरचना का उद्देश्य भारत में कर देयता से बचना था। कोर्ट ने यह भी कहा कि टाइगर ग्लोबल और वॉलमार्ट के बीच का समझौता केवल कर बचाने की योजना थी, जिसे संधि के तहत संरक्षण नहीं दिया जा सकता।


भारत में पूंजीगत लाभ कर की पुष्टि

सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि 2018 में हुई बिक्री से उत्पन्न पूंजीगत लाभ भारत में कर योग्य है। अदालत ने जोर देकर कहा कि किसी देश के भीतर अर्जित आय पर कर लगाना उस देश का संप्रभु अधिकार है। इसके साथ ही, टाइगर ग्लोबल के तर्क को खारिज कर दिया गया कि इस लेन-देन पर भारत के बाहर कर लगाया जाना चाहिए। अब यह स्पष्ट हो गया है कि फ्लिपकार्ट में हिस्सेदारी बेचकर हुए लाभ पर भारत में कर का भुगतान करना होगा।


राजस्व विभाग को मिली राहत

इस निर्णय को भारतीय राजस्व अधिकारियों के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। यह सीमा पार लेन-देन में सरकार की स्थिति को मजबूत करता है, विशेषकर उन मामलों में जहां आर्थिक गतिविधि का वास्तविक केंद्र भारत में है। अधिकारी लंबे समय से यह तर्क देते रहे हैं कि कर संधियों का दुरुपयोग कर देयता से बचने के लिए नहीं किया जाना चाहिए, खासकर भारतीय कंपनियों से जुड़े बड़े सौदों में।


भविष्य के निवेश पर प्रभाव

विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय विदेशी निवेशकों की भारतीय संपत्तियों में हिस्सेदारी संरचना और निकासी के तरीकों पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकता है। यह मामला भारत द्वारा कर संधियों की व्याख्या और उनकी कार्यवाही का एक महत्वपूर्ण उदाहरण भी बन गया है। सुप्रीम कोर्ट की यह पैनल बेंच जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की थी।