टीएमसी का ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव में समर्थन, कांग्रेस ने उठाया मुद्दा
नई दिल्ली में राजनीतिक हलचल
नई दिल्ली। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव में अब कांग्रेस को ममता बनर्जी का समर्थन मिल रहा है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने इस प्रस्ताव के समर्थन में वोट देने का निर्णय लिया है, जबकि पहले टीएमसी सांसदों ने इस प्रस्ताव की नोटिस पर हस्ताक्षर नहीं किए थे। टीएमसी का कहना था कि पहले स्पीकर को पत्र लिखकर तीन दिन का समय दिया जाना चाहिए, लेकिन अब विपक्षी एकता को ध्यान में रखते हुए उन्होंने समर्थन का निर्णय लिया है।
बजट सत्र के पहले चरण के अंतिम सप्ताह में, कांग्रेस ने ओम बिरला को पद से हटाने के लिए प्रस्ताव का नोटिस दिया था। संसद का बजट सत्र का दूसरा चरण 9 मार्च से शुरू होगा, और उसी दिन इस प्रस्ताव पर चर्चा होने की संभावना है।
कांग्रेस का रुख
कांग्रेस ने शुक्रवार को कहा कि लोकसभा स्पीकर को हटाने का प्रस्ताव संसदीय नियमों के अनुरूप है और इस पर सदन में चर्चा होनी चाहिए। विपक्ष ने आरोप लगाया है कि स्पीकर ने सदन के संचालन में भेदभाव किया है और कई मामलों में सत्तापक्ष के पक्ष में निर्णय दिए हैं। प्रस्ताव में स्पीकर पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं, जिसमें कहा गया है कि उन्होंने विपक्ष के नेता राहुल गांधी सहित कई सांसदों को बोलने की अनुमति नहीं दी।
इसके अलावा, आठ विपक्षी सांसदों को निलंबित करने और महिला सांसदों पर अनुचित आरोप लगाने का भी आरोप लगाया गया है। संसदीय नियमों के अनुसार, स्पीकर इस प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान सदन में उपस्थित रह सकते हैं, लेकिन अध्यक्ष की कुर्सी पर नहीं बैठेंगे। उन्हें अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब देने का अवसर भी मिलेगा।
संख्या बल की स्थिति
हालांकि, मौजूदा संख्या बल को देखते हुए इस अविश्वास प्रस्ताव के पारित होने की संभावना कम है। लोकसभा में 541 सदस्यों की ताकत में सत्तारूढ़ एनडीए के पास 293 सांसद हैं, जिससे प्रस्ताव का गिरना लगभग तय माना जा रहा है। फिर भी, यह मतदान विपक्ष की एकजुटता की परीक्षा माना जा रहा है।
व्हिप जारी
इस मुद्दे पर संभावित मतदान को देखते हुए बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने अपने सांसदों को व्हिप जारी किया है। बीजेपी ने पहले दो दिनों के लिए सांसदों की अनिवार्य उपस्थिति का निर्देश दिया है, जबकि कांग्रेस ने तीन दिनों तक अपने सांसदों की मौजूदगी सुनिश्चित करने को कहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भले ही यह प्रस्ताव गिर जाए, लेकिन इस बहस के जरिए संसद के अंदर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच टकराव और तीखा हो सकता है। बजट सत्र के दूसरे चरण की शुरुआत से पहले ही यह मुद्दा संसद की राजनीति को गरमा चुका है।