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तमिलनाडु के राज्यपाल बने मीम का विषय, विजय को सरकार बनाने में देरी

तमिलनाडु के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर की कार्रवाई ने सोशल मीडिया पर हलचल मचा दी है। फिल्म स्टार विजय को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने में हुई देरी ने मीम्स और मजाकों का सिलसिला शुरू कर दिया है। विजय की पार्टी ने पहले चुनाव में 108 सीटें जीती हैं, फिर भी राज्यपाल ने बार-बार उन्हें सरकार बनाने का न्योता देने में देरी की। जानें इस राजनीतिक घटनाक्रम के पीछे की पूरी कहानी और जनता की प्रतिक्रिया।
 

राज्यपाल की कार्रवाई पर उठे सवाल

तमिलनाडु के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गए हैं। फिल्म स्टार विजय को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने में हुई देरी ने कई मीम्स और मजाकों को जन्म दिया है। यदि कोई राजनीतिक उद्देश्य नहीं होता, तो विजय को पहले ही सरकार बनाने का न्योता दिया जाना चाहिए था। यह स्पष्ट था कि एक नई पार्टी ने अपने पहले चुनाव में 108 सीटें जीती हैं और वह बहुमत से केवल 10 सीट पीछे है, इसलिए उसे सरकार बनाने का आमंत्रण मिलना चाहिए था। यह दिख रहा था कि तमिलनाडु की जनता ने विजय को जनादेश दिया है और लोग चाहते हैं कि वह मुख्यमंत्री बनें। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि लोकतंत्र केवल संख्याओं पर निर्भर नहीं करता, बल्कि जनादेश का भी महत्वपूर्ण स्थान है और परंपराओं का पालन करना जरूरी है।


राज्यपाल की शर्तें और जनता की प्रतिक्रिया

हालांकि, राज्यपाल ने पहले प्रयास में विजय का दावा स्वीकार नहीं किया क्योंकि संख्या कम थी। इसके बाद विजय ने दो बार और प्रयास किए। एक बार वह 113 विधायकों के समर्थन के साथ गए और दूसरी बार 116 के साथ, लेकिन राज्यपाल ने कहा कि उन्हें और विधायकों का समर्थन लाना होगा। जब चौथी बार विजय 121 विधायकों के समर्थन के साथ पहुंचे, तो उन्हें राजभवन में एक घंटे तक इंतजार करना पड़ा, जबकि समर्थन पत्रों की जांच की गई। इस दौरान मीम्स का सिलसिला शुरू हो गया। लोगों ने सुझाव दिया कि राज्यपाल को विजय से सभी विधायकों के आधार और पैन कार्ड की कॉपी जमा करने के लिए कहनी चाहिए और साथ ही सभी 121 विधायकों की एक शॉर्ट वीडियो रिकॉर्डिंग करानी चाहिए, जिसमें वे समर्थन देने का दावा करें। मजाक में यह भी कहा गया कि राज्यपाल को 234 सदन में भाजपा के एकमात्र विधायक को बुलाकर सरकार बनाने का न्योता देना चाहिए और बहुमत साबित करने के लिए पांच साल का समय देना चाहिए। वास्तव में, राजभवन, जिसे अब लोकभवन कहा जा रहा है, एक मजाक बनता जा रहा है।