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तमिलनाडु में परिसीमन का मुद्दा: डीएमके को मिल सकता है चुनावी लाभ

तमिलनाडु में 23 अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले परिसीमन का मुद्दा गरमाया हुआ है। भाजपा के महिला आरक्षण कानून के साथ-साथ परिसीमन की प्रक्रिया पर एमके स्टालिन की डीएमके पार्टी को संभावित राजनीतिक लाभ मिल सकता है। जानें कैसे यह मुद्दा दक्षिण भारत में चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।
 

परिसीमन और महिला आरक्षण का राजनीतिक प्रभाव

भाजपा को महिला आरक्षण कानून को 2029 से लागू करने का निर्णय कितना लाभ पहुंचाएगा, यह तो भविष्य में ही पता चलेगा। इसी तरह, लोकसभा और विधानसभा की सीटों में 50 प्रतिशत तक की वृद्धि का परिसीमन का निर्णय 2029 के चुनावों में भाजपा के लिए कितना फायदेमंद साबित होगा, यह भी देखना होगा। लेकिन इस समय, परिसीमन पर चल रही चर्चाओं और संसद के विशेष सत्र में इसकी मंजूरी के प्रयासों से तमिलनाडु में एमके स्टालिन की पार्टी डीएमके को महत्वपूर्ण राजनीतिक लाभ मिल सकता है।


यह ध्यान देने योग्य है कि परिसीमन की प्रक्रिया का विरोध सभी विपक्षी दल कर रहे हैं, लेकिन दक्षिण भारत में इसका सबसे अधिक विरोध हो रहा है। वर्तमान में, तमिलनाडु एकमात्र ऐसा राज्य है जहां चुनाव हो रहे हैं।


तमिलनाडु की सभी 234 विधानसभा सीटों के लिए मतदान 23 अप्रैल को होना है। इससे पहले, परिसीमन का मुद्दा तेजी से उठ रहा है। संसद का तीन दिवसीय सत्र शुरू हो चुका है, जिसमें परिसीमन के लिए एक बिल पेश किया गया है। 16 अप्रैल को, एमके स्टालिन ने परिसीमन के विषय पर अपनी लिखित राय प्रस्तुत की, जिसे दिल्ली और तमिलनाडु के क्षेत्रीय समाचार पत्रों में प्रकाशित किया गया। उन्होंने दक्षिण के राज्यों की पहचान और राजनीतिक स्थिति पर चर्चा की है।


स्टालिन ने परिसीमन को दक्षिण भारत के राज्यों के अधिकारों को कम करने के प्रयास के रूप में देखा है। 23 अप्रैल को होने वाले मतदान से पहले, परिसीमन कानून की पहल और स्टालिन की स्थिति ने तमिल अस्मिता को डीएमके के पक्ष में मोड़ दिया है, जिससे उन्हें चुनावी लाभ मिल सकता है।