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तमिलनाडु में विजय की जीत: उत्तर भारत की राजनीति से भिन्नता

तमिलनाडु में अभिनेता विजय की मुख्यमंत्री बनने की जीत ने उत्तर भारत की राजनीति से भिन्नता को उजागर किया है। इस लेख में हम देखेंगे कि कैसे तमिल संस्कृति में विविधता और गर्व का अहसास है, और विजय की जीत ने युवा पीढ़ी के बीच एक नई उम्मीद जगाई है। जानें कि कैसे दक्षिण भारत की राजनीति उत्तर भारत से अलग है और विजय ने किस तरह से तमिल पहचान को प्रोत्साहित किया।
 

तमिलनाडु में विजय का मुख्यमंत्री बनना

तमिलनाडु में अभिनेता विजय के मुख्यमंत्री बनने को उत्तर भारत में किस दृष्टिकोण से देखा गया? ऐसा प्रतीत होता है कि विजय का नाम केवल एक चेहरा है। तमिल लोगों में फिल्म उद्योग के प्रति गहरी दीवानगी है। लेकिन करुणानिधि, एमजीआर, और जयललिता की राजनीति और उनके चुनावी प्रचार का अनुभव यह दर्शाता है कि तमिल संस्कृति में गर्व का एक अनूठा अहसास है। वहां भाषा और पहचान की सुरक्षा में सभ्यता अपने रंग में रंगी हुई है। नायकर, पेरियार, करुणानिधि, एमजीआर, जयललिता से लेकर स्टालिन और उनके बेटे उदयनिधि ने सामाजिक आंदोलनों को लेकर चाहे जितनी आलोचना की हो, लेकिन उत्तर भारत के मंडलवादी लालू यादव और तमिलनाडु के करुणानिधि की राजनीति में स्पष्ट अंतर है।


तमिल समाज ने विविधता के बीच सभी को समाहित किया है। नायकर-पेरियार के आंदोलन की पार्टी की ब्राह्मण मुख्यमंत्री जयललिता ने ‘अम्मा’ के रूप में लंबे समय तक शासन किया। इन सभी नेताओं की मूर्तियां स्थापित की गईं, लेकिन इनमें से कोई भी समाज को विभाजित करने वाली नहीं है।


वहीं उत्तर भारत में क्या स्थिति है? केवल बंटवारा और विभाजन। यह एक कठोर सत्य है। लेकिन सोचिए, गांधी से लेकर मोदी तक के अस्सी वर्षों पर? क्या उत्तर भारत में हिंदू बनाम मुस्लिम के आधार पर देश का विभाजन नहीं हुआ? मंडल और कमंडल के कारण समाज में जो विभाजन हुआ है, वह शासन और राजनीति में ठगी का परिणाम है।


देश के विभाजन के लिए उत्तर प्रदेश की हिंदू-मुस्लिम राजनीति जिम्मेदार थी, तो समाज के विभाजन के लिए वीपी सिंह के समय का मंडल-कमंडल भी उतना ही जिम्मेदार है। हिंदी राष्ट्रभाषा है, लेकिन हिंदी भाषियों में आत्म-सम्मान की कमी है। ऐसे भिन्नताएं उत्तर और दक्षिण के साधु-संतों, धार्मिक आचरण, उत्सवों और साफ-सफाई में स्पष्ट हैं। उत्तर भारत भीड़, नारे, और धर्म के भावों में जीता है, जबकि दक्षिण भारत की भाषाएं और लोकभावनाएं अलग हैं।


तमिलनाडु का राजनीतिक मनोविज्ञान अलग है। केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भाजपा का प्रभाव क्यों नहीं है? क्यों वहां कांग्रेस को स्वीकार किया जाता है? हर प्रदेश में अपने दम पर मुख्यमंत्री बनने की प्रवृत्ति है। यह कम्युनिस्ट सीपीएम की केंद्रीकृत कमान का भी इतिहास है। केरल में नंबूदरीपाद से लेकर विजयन तक जितने मुख्यमंत्री हुए, वे ऊपर से नहीं थोपे गए।


विजय की जीत का कारण यह है कि तमिल युवा दशकों पुराने परिवारवादी ढांचे से थक चुके थे। उन्हें लगा कि विजय के साथ एक नया युग शुरू हो रहा है। विजय ने तमिल पहचान को आक्रामक नारे में नहीं बदला, बल्कि उसकी सहज भावना को प्रोत्साहित किया। वे मोदी की तरह गरजते नहीं हैं। भीड़ उन्मादी थी, लेकिन विजय का अंदाज शांत था।


केरल में सतीशन और तेलंगाना में रेवंत रेड्डी का भी ऐसा ही रुख रहा है। आंध्र में चंद्रबाबू का दशकों से यही तरीका रहा है। कर्नाटक में सिद्धारमैया, शिवकुमार और भाजपा के नेता येदियुरप्पा का भी यही हाल है।


इसलिए इन राज्यों में कोई नेता उत्तर भारत की राजनीति, विशेषकर मोदी-शाह की शैली में फिट नहीं बैठता। सभी नेता आत्मनिर्भर हैं। वहीं उत्तर भारत की सच्चाई है कि नरेंद्र मोदी किसी भी अनाम व्यक्ति को मुख्यमंत्री बना सकते हैं और अमित शाह को रिमोट देकर शासन चला सकते हैं।