तृणमूल कांग्रेस की स्थिति: बगावत और विलय के बाद का संकट
तृणमूल कांग्रेस की मुश्किलें
तृणमूल कांग्रेस की स्थिति अब ऐसी हो गई है जैसे जलते हुए आलू, जिसे कोई छूने को तैयार नहीं। यह पहली बार है जब किसी राजनीतिक दल में इतनी बड़ी टूट हुई है और किसी ने भी यह दावा नहीं किया कि वे असली तृणमूल कांग्रेस हैं। पश्चिम बंगाल के विधायकों ने बगावत के बाद अलग गुट की मान्यता मांगी है और यह भी कहा है कि उनकी अध्यक्ष ममता बनर्जी हैं, लेकिन उन्होंने खुद को असली तृणमूल कांग्रेस नहीं कहा।
दूसरी ओर, जब संसदीय दल टूट गया, तो तृणमूल से अलग हुए 20 सांसदों ने अपने गुट का विलय त्रिपुरा की एक छोटी पार्टी, नेशनलिस्ट सिटिजन पार्टी ऑफ इंडिया में कर दिया। इससे पहले, इस पार्टी का नाम दिल्ली में शायद ही कोई जानता था। विलय के बाद सांसदों ने यह घोषणा की कि वे एनडीए को समर्थन देंगे, जिससे अचानक एक पार्टी एनडीए में भाजपा के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई। चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी और नीतीश कुमार की जनता दल यू की स्थिति कमजोर हो गई है।
विलय के बाद, सुदीप बंदोपाध्याय ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि असली तृणमूल कांग्रेस का फैसला अदालत में होगा। सुदीप बंदोपाध्याय को ममता बनर्जी का करीबी माना जाता था। यह भी जानकारी है कि बागी सांसदों का मामला दो हफ्ते से अधिक समय से अटका हुआ था। 19 सांसदों ने 18 मई को स्पीकर को पत्र लिखा था, लेकिन वे एक नेता की तलाश में थे। काकोली घोष दस्तीदार हमेशा खुद को चीफ व्हिप बताती रहीं, लेकिन अब उन्हें एक नेता मिल गया है। हालांकि, वे भी तृणमूल में रुचि नहीं ले रही हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि तृणमूल की बदनामी का बोझ कोई भी अपने ऊपर नहीं लेना चाहता। पश्चिम बंगाल के लोगों के बीच पार्टी और उसके नेताओं की छवि बहुत खराब हो गई है, जिससे लोगों में नाराजगी बढ़ी है। इसलिए बागी नए नाम और पहचान के साथ काम करना चाहते हैं।