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दिल्ली की सत्ता और चुनावी गणित: मोदी का आत्मविश्वास और जनता की प्रतिक्रिया

दिल्ली की सत्ता में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आत्मविश्वास और चुनावी गणित पर एक गहन विश्लेषण। क्या जनता की प्रतिक्रिया सत्ता को प्रभावित करेगी? इस लेख में जानें कि कैसे मोदी और शाह मतदाता सूचियों को सुधारने के प्रयास में जुटे हैं और क्या यह उनके लिए फायदेमंद साबित होगा। क्या सत्ता प्रदर्शन जनता की भावनाओं को समझेगा? जानें इस लेख में।
 

दिल्ली की सत्ता का पुराना रोग


दिल्ली की सत्ता में एक पुरानी समस्या है। जब प्रधानमंत्री सत्ता में होते हैं, तो उन्हें यह विश्वास हो जाता है कि वे भारत को समझ चुके हैं। वे यह मान लेते हैं कि जनता की आवश्यकताओं को भली-भांति जान चुके हैं। किसे राशन चाहिए, किसे आरक्षण, किस जाति को क्या चाहिए, और किस धर्म को किससे डराना है, इसका पूरा हिसाब रखा जाता है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह तो हमेशा इस गणित में लगे रहते हैं। उनकी सर्वे टीम लगातार काम करती है, और पार्टी तथा संघ संगठन भी फीडबैक देते हैं।


जवाहरलाल नेहरू को छोड़कर, हर प्रधानमंत्री ने इसी विश्वास के साथ कार्य किया है कि जब वे इतना कर रहे हैं, तो लोग उन्हें वोट देंगे। हालांकि, नेहरू के बाद हर प्रधानमंत्री को जनता ने सत्ता से बेदखल किया है, चाहे वे कितनी भी उपलब्धियां क्यों न गिनाते रहें।


इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, नरसिंह राव, और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं को भी इसी तरह की स्थिति का सामना करना पड़ा। हर चुनावी हार के पीछे एक समानता थी: सत्ता को अपने बनाए गणित पर भरोसा था।


इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी के दौरान विपक्ष को जेल में डाल दिया था, फिर भी 1977 में चुनाव में कांग्रेस को केवल 154 सीटें मिलीं। इसी तरह, राजीव गांधी ने 1984 में 414 सीटें जीतीं, लेकिन 1989 में उनकी पार्टी केवल 197 सीटों पर सिमट गई।


भारत में हर बड़ी चुनावी हार के पीछे सत्ता का दुरुपयोग, आतंक, और चुनावी धांधलियां होती हैं। 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी को हार का सामना करना पड़ा, जबकि उन्होंने शाइनिंग इंडिया का नारा दिया था।


2024 के चुनाव में भी कुछ ऐसा ही हुआ। अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बावजूद, उत्तर प्रदेश में भाजपा को कम सीटें मिलीं।


नरेंद्र मोदी और अमित शाह मतदाता सूचियों को सुधारने के प्रयास में जुटे हैं। क्या वे वफादार वोटों की संख्या को 50 प्रतिशत से ऊपर ले जा पाएंगे? क्या लोग इस गड़बड़ी को सहन करेंगे? यह वही मौन सत्ता पलट क्रांति होगी, जैसा इंदिरा गांधी के खिलाफ हुआ था।


प्रधानमंत्री का आत्मविश्वास उन्हें सत्ता में बनाए रखता है। पुराने नेताओं और नरेंद्र मोदी के बीच एक बुनियादी फर्क है। मोदी ने हिंदुओं में भक्ति आंदोलन बनाया है, लेकिन चुनाव आयोग के जरिए वोटर लिस्ट का पुनर्लेखन करवाना पड़ रहा है।


इसलिए, सत्ता प्रदर्शन नहीं देखती। वह हमेशा अपने आंकड़ों पर भरोसा करती है। दिल्ली की सत्ता को यह विश्वास दिलाया जाता है कि वे भारत के भाग्य विधाता हैं।