दिल्ली के हरीश राणा की दया मृत्यु की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला आज
सुप्रीम कोर्ट का फैसला: हरीश राणा की जिंदगी का सवाल
नई दिल्ली: 13 वर्षों से कोमा जैसी स्थिति में जीवन और मृत्यु के बीच झूलते हरीश राणा के मामले में आज सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय आने वाला है। 32 वर्षीय हरीश 2013 से पूरी तरह बेहोश हैं और उन्हें सांस लेने और पोषण के लिए ट्यूबों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। उनके माता-पिता ने अपने बेटे को इस दर्द से मुक्त करने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी है।
राणा परिवार ने दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट में दूसरी बार निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी थी। आज अदालत यह तय करेगी कि हरीश के जीवन को चिकित्सा सहायता से जारी रखा जाए या उन्हें गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार दिया जाए।
13 वर्षों से रुकी हुई हरीश की जिंदगी
2013 से हरीश राणा एक अचेतन अवस्था में हैं। वह न तो खुद सांस ले पा रहे हैं और न ही भोजन ग्रहण कर सकते हैं। उनकी जिंदगी ट्रेकियोस्टोमी और गैस्ट्रोस्टोमी ट्यूबों के सहारे चल रही है। परिवार के लिए ये साल उम्मीद और निराशा के बीच एक अंतहीन संघर्ष बन चुके हैं।
वह हादसा जिसने सब कुछ बदल दिया
20 अगस्त 2013 को, राखी के दिन, चंडीगढ़ विश्वविद्यालय में सिविल इंजीनियरिंग के छात्र हरीश चौथी मंजिल से गिर गए। सिर में गंभीर चोटों के कारण वह पूरी तरह विकलांग हो गए। डॉक्टरों के अनुसार, वह न आंखें खोल पा रहे थे और न ही हाथ-पैर हिला पा रहे थे। उसी दिन से उनकी जिंदगी एक कोमा जैसी स्थिति में अटक गई।
AIIMS के कमरे तक सीमित हो गई दुनिया
हरीश के इलाज के साथ ही पूरा परिवार AIIMS के एक कमरे तक सीमित हो गया। इलाज के भारी खर्च के कारण परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ती चली गई। माता-पिता ने दिल्ली के महावीर एन्क्लेव में अपना घर बेचकर गाजियाबाद में बसने का निर्णय लिया, ताकि बेटे के इलाज को जारी रखा जा सके।
पहली बार उठी दया मृत्यु की मांग
जब ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं बची, तो जुलाई 2024 में हरीश के माता-पिता ने दिल्ली हाईकोर्ट में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की याचिका दायर की। इच्छामृत्यु वह प्रक्रिया है, जिसमें असाध्य बीमारी से जूझ रहे व्यक्ति को पीड़ा से मुक्त करने के लिए जानबूझकर जीवन समाप्त किया जाता है। यह 'सक्रिय' या 'निष्क्रिय' हो सकती है।
भारत में इच्छामृत्यु का कानून
भारत में सक्रिय इच्छामृत्यु, यानी दवा या इंजेक्शन देकर मृत्यु देना अवैध है। जबकि निष्क्रिय इच्छामृत्यु को 2011 में अरुणा शानबाग केस में सुप्रीम कोर्ट ने मान्यता दी थी। मुंबई की नर्स अरुणा शानबाग 1973 में एक वार्ड बॉय के हमले के बाद 42 साल तक कोमा जैसी हालत में रहीं और 2015 में उनका निधन हो गया।
इसके बाद 2018 में 'कॉमन कॉज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया' केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गरिमा के साथ मरने का अधिकार जीवन के अधिकार का हिस्सा है।
हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से मिली निराशा
दिल्ली हाईकोर्ट ने जुलाई 2024 में माता-पिता की याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि हरीश "बिना किसी बाहरी सहायता के स्वयं को जीवित रखने में सक्षम था।" अदालत के अनुसार, फीडिंग ट्यूब हटाने से भूख से मौत होगी, जिसे उसने सक्रिय इच्छामृत्यु माना।
नवंबर 2024 में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, लेकिन वहां भी याचिका खारिज हो गई। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा कि हरीश जीवन रक्षक मशीनों पर "पूरी तरह से निर्भर" नहीं है। हालांकि, उन्होंने केंद्र सरकार से इलाज और देखभाल पर विचार करने को कहा।
हालत बिगड़ने पर फिर सुप्रीम कोर्ट
एक साल बाद माता-पिता ने फिर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। उन्होंने कहा कि हरीश की स्थिति और खराब हो गई है और उसे "कृत्रिम रूप से जीवित" रखा जा रहा है, जिसमें सुधार की कोई संभावना नहीं है।
मेडिकल बोर्ड की राय
2023 में तय किए गए दिशा-निर्देशों के तहत सुप्रीम कोर्ट ने प्राथमिक और द्वितीयक मेडिकल बोर्ड गठित किए। क्योंकि हरीश ने कोई वसीयत नहीं बनाई थी, इसलिए विशेषज्ञों की राय ली गई। प्राथमिक बोर्ड ने कहा कि हरीश के ठीक होने की संभावना नगण्य है और उसकी हालत बेहद दयनीय है। 18 दिसंबर को आई दूसरी रिपोर्ट भी इसी के अनुरूप थी।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जेबी परदीवाला ने कहा, "यह बहुत दुखद खबर है। हम इस लड़के को इस हालत में नहीं रख सकते।" इसके बाद अदालत ने अंतिम फैसले के लिए 15 जनवरी की तारीख तय की। 13 जनवरी को जजों ने हरीश के माता-पिता से भी मुलाकात की।
देश के लिए निर्णायक घड़ी
यदि सुप्रीम कोर्ट जीवन रक्षक उपचार बंद करने की अनुमति देता है, तो यह 2018 में वैध घोषित होने के बाद भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु का पहला ज्ञात मामला होगा। फैसला चाहे जो भी हो, यह दया मृत्यु के मुद्दे पर देश के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित होगा।