नाटो: इतिहास, सदस्यता और रूस के साथ तनाव
नाटो का परिचय
नाटो, जिसे अंग्रेजी में NATO और हिंदी में नॉटो या नाटो कहा जाता है, का पूरा नाम नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन है। यह संगठन रूस के लिए एक चुनौती बना हुआ है। इसकी कहानी का आरंभ 1945 से होता है, जब द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हुआ। उस समय सोवियत संघ और अमेरिका के बीच वैश्विक प्रभुत्व की प्रतिस्पर्धा शुरू हुई। जब साम्यवादी विस्तार को रोकने के लिए अमेरिका ने कदम उठाए, तो सोवियत संघ ने 1948 में बर्लिन की नाकेबंदी की। इस घटना ने अमेरिका को यह सोचने पर मजबूर किया कि उसे सोवियत संघ के खिलाफ एकजुट होना चाहिए।
उत्तर अटलांटिक संधि पर हस्ताक्षर
12 देशों ने 1949 में उत्तर अटलांटिक संधि पर हस्ताक्षर किए, जिसमें फ्रांस, बेल्जियम, लक्जमबर्ग, ब्रिटेन, नीदरलैंड, कनाडा, डेनमार्क, आइसलैण्ड, इटली, नार्वे, पुर्तगाल और अमेरिका शामिल थे। इस संधि का उद्देश्य सामूहिक सुरक्षा और सहयोग को बढ़ावा देना था। शीत युद्ध के दौरान और बाद में, कई अन्य देशों ने भी नाटो में शामिल होने की प्रक्रिया शुरू की।
नाटो के सदस्य देशों की सूची
नाटो के वर्तमान में 30 सदस्य देश हैं, जिनमें अल्बानिया, बेल्जियम, बुल्गारिया, कनाडा, क्रोएशिया, चेक गणराज्य, डेनमार्क, एस्तोनिया, फ़्रान्स, जर्मनी, यूनान, हंगरी, आइसलैण्ड, इटली, लातविया, लिथुआनिया, लक्ज़मबर्ग, नीदरलैंड, नॉर्वे, पोलैंड, पुर्तगाल, रोमानिया, स्लोवाकिया, स्लोवेनिया, स्पेन, तुर्की, यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त राज्य अमेरिका और मॉन्टिनीग्रो शामिल हैं।
नाटो और रूस की सैन्य ताकत
रूस की सेना, जो अमेरिका के बाद दूसरी सबसे बड़ी है, में लगभग 1,154,000 सक्रिय सैनिक हैं। इसके अलावा, 250,000 रिजर्व सैनिक भी हैं। रूस के पास परमाणु हथियारों का सबसे बड़ा संग्रह है, जिसमें लगभग 6,400 वॉरहेड शामिल हैं। वहीं, नाटो के पास लगभग 1,346,400 सैनिक हैं, जिनमें से 165,000 सक्रिय हैं।