पंजाब में कट्टरपंथी राजनीति का उभार: अमृतपाल सिंह ने उम्मीदवार की घोषणा की
पंजाब में कट्टरपंथी राजनीति का बढ़ता प्रभाव
हाल के दिनों में पंजाब में कट्टरपंथी राजनीति के बढ़ते प्रभाव की आशंका जताई जा रही थी। पिछले लोकसभा चुनाव में 'वारिस पंजाब दे' संगठन के नेता अमृतपाल सिंह की जीत ने इस बात की पुष्टि की। अमृतपाल के अलावा, सरबजीत सिंह खालसा ने भी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीता। सरबजीत का परिवार इंदिरा गांधी की हत्या के मामले में फांसी की सजा का सामना कर चुका है। पंजाब की 13 में से दो सीटों पर कट्टरपंथियों की जीत कोई संयोग नहीं है। इसके बाद, दोनों ने मिलकर अकाली दल (वारिस पंजाब दे) नामक पार्टी का गठन किया। अब, जेल में बंद अमृतपाल ने अपनी पार्टी के पहले उम्मीदवार की घोषणा की है।
अमृतपाल का पहला उम्मीदवार
पंजाब में विधानसभा चुनाव अभी कुछ महीने दूर हैं, और अन्य पार्टियों ने चुनाव की तैयारी शुरू नहीं की है, लेकिन अमृतपाल ने पहले ही अपने उम्मीदवार की घोषणा कर दी है। सतवंत सिंह को बस्सी पठाना सीट से उम्मीदवार बनाया गया है। सतवंत के पिता केहर सिंह को भी इंदिरा गांधी की हत्या के मामले में फांसी की सजा मिली थी। यह एक दिलचस्प संयोग है कि इंदिरा गांधी के हत्यारे का बेटा सांसद बना और अब हत्या के दूसरे दोषी के बेटे को विधानसभा की पहली सीट दी गई है। यह कट्टरपंथी वोटों को सुरक्षित करने का प्रयास प्रतीत होता है।
चुनाव में कट्टरपंथी समूहों की भूमिका
पंजाब में इस विषय पर गहरी चर्चा चल रही थी कि अमृतपाल और सरबजीत जैसे नेता चुनाव जीतने के बाद भी उन परिवारों की ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं, जिन्होंने खालिस्तान राज्य की लड़ाई में भाग लिया था। कहा जा रहा है कि खालिस्तान आंदोलन और ऑपरेशन ब्लू स्टार में जान गंवाने वालों की कोई सुध नहीं ली जा रही है। इसी संदर्भ में, अमृतपाल ने केहर सिंह के बेटे को उम्मीदवार बनाकर एक बड़ा कदम उठाया है। इस बार के चुनाव में कट्टरपंथी समूहों की महत्वपूर्ण भूमिका होने की संभावना है।