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पंजाब में कांग्रेस के अंदरूनी विवाद चुनावी रणनीति को प्रभावित कर सकते हैं

पंजाब में आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारी में कांग्रेस पार्टी को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। स्थानीय निकाय चुनावों में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद पार्टी के भीतर मतभेद बढ़ गए हैं। विधायक दल के नेता प्रताप सिंह बाजवा की बैठक से अचानक बाहर निकलने से पार्टी की आंतरिक स्थिति और भी जटिल हो गई है। प्रदेश अध्यक्ष राजा अमरिंदर सिंह वारिंग और अन्य नेताओं के बीच खींचतान ने चुनावी रणनीति को प्रभावित किया है। क्या कांग्रेस इस संकट से उबर पाएगी? जानें पूरी कहानी में।
 

पंजाब विधानसभा चुनाव की तैयारी में कांग्रेस की चुनौतियाँ


पंजाब में मार्च 2024 में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, लेकिन इससे पहले कांग्रेस पार्टी ने स्थानीय निकाय चुनावों में निराशाजनक प्रदर्शन किया है। इस असफलता के बाद पार्टी के भीतर मतभेद बढ़ गए हैं। हाल ही में हुई एक बैठक में विधायक दल के नेता प्रताप सिंह बाजवा बैठक से अचानक बाहर चले गए। इस बैठक में पार्टी के नेता स्पष्ट रूप से विभिन्न गुटों में विभाजित नजर आए।


प्रदेश अध्यक्ष राजा अमरिंदर सिंह वारिंग और सुखजिंदर सिंह रंधावा के गुट अलग हैं, जबकि पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी की अपनी अलग रणनीति है। स्थानीय निकाय चुनावों में राणा गुरजीत सिंह ने अपने क्षेत्र में पार्टी को जीत दिलाकर अपनी स्थिति मजबूत की है।


चरणजीत सिंह चन्नी को पार्टी में अधिक महत्व दिया जा रहा था, लेकिन चमकौर साहिब क्षेत्र में स्थानीय चुनावों के परिणामों के बाद उनकी स्थिति में सुधार हुआ है। इसके विपरीत, गिद्दरबाह क्षेत्र में कांग्रेस की हार ने राजा अमरिंदर सिंह वारिंग को आलोचना का सामना करना पड़ा है। इस बीच, प्रदेश अध्यक्ष के पद में बदलाव की चर्चा भी शुरू हो गई है।


हालांकि, राज्य के प्रभारी भूपेश बघेल ने इस बात से इनकार किया है, लेकिन कांग्रेस आलाकमान को लगता है कि वारिंग के नेतृत्व में चुनाव जीतना कठिन होगा। ध्यान देने योग्य है कि वारिंग और रंधावा दोनों ने 2022 में विधानसभा चुनाव जीते थे, लेकिन 2024 में उपचुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। दोनों नेताओं ने अपनी पत्नियों को चुनाव में उतारा था, लेकिन वे भी हार गईं। इस प्रकार, पंजाब में चल रही आंतरिक खींचतान कांग्रेस के लिए एक गंभीर चुनौती बन सकती है।