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पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव: अमेरिका और इजराइल का ईरान पर सैन्य हमला

पश्चिम एशिया में अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर सैन्य कार्रवाई ने स्थिति को गंभीर बना दिया है। हमलों के बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई की, जिससे क्षेत्र में तनाव बढ़ गया है। भारत के लिए यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि यह विश्व के बड़े तेल आयातकों में से एक है। इस संघर्ष का वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी प्रभाव पड़ सकता है। क्या यह टकराव क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को बदल सकता है? जानें पूरी कहानी में।
 

पश्चिम एशिया में सैन्य कार्रवाई का आगाज

पश्चिम एशिया में हालात अचानक गंभीर हो गए हैं, जब अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान के खिलाफ एक व्यापक सैन्य अभियान शुरू किया। अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस कार्रवाई को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक बताते हुए कहा कि तेहरान को परमाणु हथियारों की क्षमता हासिल करने से रोकना बेहद जरूरी है।


हमलों की शुरुआत और ईरान की प्रतिक्रिया

हमलों की पहली लहर में तेहरान के कई महत्वपूर्ण स्थलों पर विस्फोट हुए। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई के परिसर और राष्ट्रपति के ठिकानों को निशाना बनाया गया। हालांकि, कुछ रिपोर्टों के अनुसार, खामेनेई को पहले ही सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया गया था। ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड के कई वरिष्ठ कमांडरों के मारे जाने की भी खबरें आई हैं।


ईरान का जवाबी हमला

हमलों के तुरंत बाद, ईरान ने इजराइल और क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलें दागीं। कतर की राजधानी दोहा और यूएई की राजधानी अबू धाबी में विस्फोटों की आवाजें सुनाई दीं। बहरीन में अमेरिकी पांचवें बेड़े के सेवा केंद्र के निकट हमले की सूचना मिली, जिसके बाद जुफैर क्षेत्र को खाली कराया गया। कुवैत ने अपनी सुरक्षा के अधिकारों की बात की, जबकि जॉर्डन ने दो मिसाइलें गिराने का दावा किया। इस बीच, इजराइल में आपातकाल घोषित कर दिया गया है।


सामाजिक और आर्थिक प्रभाव

ईरान के दक्षिणी शहर मीनाब में एक विद्यालय पर हमले में 40 से अधिक छात्रों की मौत की खबर ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। तेहरान में नागरिकों में दहशत का माहौल है, और पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें लग गई हैं। इस संघर्ष का वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी तात्कालिक प्रभाव पड़ता दिख रहा है। खाड़ी क्षेत्र विश्व तेल आपूर्ति का एक प्रमुख स्रोत है, और यदि ईरान ने इसे अवरुद्ध किया, तो ऊर्जा संकट गहरा सकता है।


भारत की चिंताएं

भारत के लिए यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है, क्योंकि यह विश्व के बड़े तेल आयातकों में से एक है। भारत द्वारा आयातित कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा इसी जलडमरूमध्य से होकर आता है। कीमतों में एक डॉलर की वृद्धि से भारत के आयात बिल पर अरबों डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। इसके अलावा, खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक कार्यरत हैं, और हवाई क्षेत्र बंद होने से उड़ानों पर असर पड़ा है।


सामरिक दृष्टिकोण

यह टकराव सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। यदि अमेरिकी और इजराइली हमलों का उद्देश्य केवल परमाणु कार्यक्रम को रोकना नहीं है, तो यह क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को पूरी तरह बदल सकता है। ईरान लंबे समय से अपने प्रभाव के जरिए शक्ति संतुलन बनाए हुए है। यदि वह सीधे अमेरिकी ठिकानों पर हमले कर रहा है, तो यह छाया युद्ध से खुली जंग की ओर बढ़ने का संकेत हो सकता है।


संभावित वैश्विक संकट

हालांकि इसे विश्व युद्ध कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री मार्गों और क्षेत्रीय गठबंधनों पर पड़ने वाला प्रभाव इसे वैश्विक संकट बना सकता है। यदि कूटनीतिक प्रयास विफल रहते हैं और होर्मुज या बाब अल मंदेब जैसे मार्ग अवरुद्ध होते हैं, तो एशिया, यूरोप और अमेरिका सभी प्रभावित होंगे। इस समय भारत के सामने संतुलित कूटनीति, ऊर्जा आपूर्ति का विविधीकरण, सामरिक भंडार का उपयोग और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सबसे बड़ी प्राथमिकताएं हैं।