पश्चिम बंगाल उपचुनाव में चुनाव आयोग की भूमिका पर हाई कोर्ट की नाराजगी
चुनाव आयोग की साख पर उठे सवाल
‘इंडियन एक्सप्रेस’ द्वारा चुनाव आयोग के भीतर की खींचतान और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यशैली पर रिपोर्टिंग के बाद, कई लोगों को इस संवैधानिक संस्था की प्रतिष्ठा की चिंता सताने लगी है। लेकिन क्या किसी मीडिया या विपक्षी दल ने चुनाव आयोग की साख को नुकसान पहुंचाया है? वास्तव में, चुनाव आयोग ने अपनी साख को खुद ही कमजोर किया है। इसके कार्यों से उसकी नीयत पर सवाल उठते हैं। यह केवल एसआईआर का मामला नहीं है। आचार संहिता के उल्लंघन, दलबदल के मामलों में निर्णय लेने या चुनाव चिन्ह आवंटन में, आयोग की पक्षधरता भाजपा के प्रति स्पष्ट दिखाई देती है। इस कारण से उसकी साख पर सवाल उठ रहे हैं।
हाई कोर्ट की तीखी टिप्पणी
पश्चिम बंगाल में कलकत्ता हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग के रवैये पर नाराजगी जताई है। उपचुनाव के दौरान, नंदीग्राम और रेजीनगर में भाजपा की स्थिति को देखते हुए, चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस का नाम और चुनाव चिन्ह फ्रीज कर दिया। ममता बनर्जी के खेमे को एक चिन्ह और ऋतब्रत बनर्जी को अलग चिन्ह आवंटित किया गया। इस मामले की सुनवाई के दौरान, हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। जस्टिस कृष्णा राव ने कहा कि वे चुनाव आयोग के इस रवैये से थक गए हैं।
चुनाव आयोग के निर्णयों पर सवाल
चुनाव आयोग ने लिफाफा चुनाव चिन्ह को ऋतब्रत बनर्जी की पार्टी को आवंटित किया, जो पहले से इंडियन सेकुलर फ्रंट को मिला हुआ था। यह निर्णय स्पष्ट रूप से नंदीग्राम में मतदाताओं को भ्रमित करने के लिए किया गया है। ममता बनर्जी की पार्टी के उम्मीदवार को हटाने और कांग्रेस के उम्मीदवार को गिरफ्तार करने के बाद, चुनाव आयोग ने यह कदम उठाया। हाई कोर्ट ने कहा कि आयोग ने 189 संभावित चुनाव चिन्हों में से लिफाफा चिन्ह को चुना, जो पक्षपात का एक ठोस प्रमाण है।