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पश्चिम बंगाल चुनाव में केंद्रीय एजेंसियों की भूमिका पर सवाल

पश्चिम बंगाल के चुनाव में केंद्रीय एजेंसियों की भूमिका ने राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया है। पिछले 12 वर्षों में अघोषित परंपराएं समाप्त हो गई हैं, जिससे विपक्षी दलों के लिए चुनाव लड़ना चुनौतीपूर्ण हो गया है। ममता बनर्जी की चुनाव प्रबंधन एजेंसी पर छापे और तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के खिलाफ कार्रवाई ने चुनावी माहौल को और भी तनावपूर्ण बना दिया है। जानिए इस मुद्दे पर और क्या कहा जा रहा है।
 

राजनीति में लोकलाज और अघोषित परंपराएं

राजनीति के पुराने नेता अक्सर यह बात दोहराते हैं कि यह केवल नियमों, सिद्धांतों, विचारों या परंपराओं से नहीं चलती, बल्कि लोकलाज भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पहले के नेता इस बात का खास ध्यान रखते थे। भले ही नियम न हों, लेकिन एक अनकही परंपरा रही है कि चुनाव के समय केंद्रीय या राज्य एजेंसियां सत्ताधारी दल के विरोधियों को परेशान नहीं करतीं। लेकिन पिछले 12 वर्षों में इन अघोषित परंपराओं और लोकलाज को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया है। चुनाव के दौरान विरोधी पार्टियों के नेताओं के खिलाफ न केवल छापे मारे जाते हैं, बल्कि चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को केंद्रीय एजेंसियों द्वारा नोटिस देकर हाजिर होने के लिए भी कहा जाता है।


पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल

पश्चिम बंगाल के हालिया चुनाव में कई घटनाएं सामने आई हैं। पहले, ममता बनर्जी के चुनाव प्रबंधन की एजेंसी आईपैक पर छापा मारा गया। इसके बाद, चुनाव प्रचार के दौरान आईपैक के एक निदेशक को गिरफ्तार किया गया। इसी बीच, तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पार्थ चटर्जी के घर पर भी छापा पड़ा, जबकि वे पहले से ही एक मामले में कई साल जेल काट चुके हैं। इसके अलावा, तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार देबाशीस कुमार के घर पर भी ईडी ने छापा मारा और उन्हें पूछताछ के लिए बुलाया। टीएमसी के एक अन्य उम्मीदवार शोभन देव चटर्जी के कार्यालय पर भी छापा पड़ा। ऐसे में, विपक्षी पार्टियों के लिए चुनाव लड़ना कितना मुश्किल हो गया है, यह सोचने वाली बात है। चुनाव आयोग इस पर चुप्पी साधे हुए है, लेकिन यदि पश्चिम बंगाल की कोई एजेंसी भाजपा के उम्मीदवार के खिलाफ कार्रवाई करे, तो आयोग तुरंत सक्रिय हो जाता है।