पश्चिम बंगाल चुनाव में विपक्षी गठबंधन की जटिलताएँ
विपक्षी राजनीति के विरोधाभास
दिल्ली में विपक्षी राजनीति के कई विरोधाभास हैं, जो चुनावी और जमीनी राजनीति में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। पश्चिम बंगाल के चुनाव में यह विरोधाभास विशेष रूप से देखने को मिल रहा है। एक ओर, 'इंडिया' ब्लॉक की पार्टियां आपस में संघर्ष कर रही हैं। दूसरी ओर, दिल्ली में कांग्रेस का समर्थन करने वाली पार्टियां ममता बनर्जी के साथ खुलकर खड़ी हैं। हेमंत सोरेन, तेजस्वी यादव, अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल जैसे नेता ममता के लिए प्रचार करने पहुंचे हैं, जबकि कांग्रेस की स्थिति कमजोर नजर आ रही है। कांग्रेस सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा कर रही है, लेकिन उसकी लड़ाई गंभीर नहीं लगती। ऐसा प्रतीत होता है कि वह केवल कुछ जिलों में सक्रिय है और अन्य जगहों पर उसने वॉकओवर दे दिया है। इस स्थिति से यह सवाल उठता है कि क्या अन्य सहयोगी पार्टियां कांग्रेस से दूरी बना रही हैं?
बिहार और झारखंड की स्थिति
बिहार और झारखंड की सहयोगी पार्टियों के संदर्भ में यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। झारखंड में कांग्रेस और जेएमएम के बीच तालमेल है, जहां कांग्रेस जेएमएम नेतृत्व वाली सरकार का हिस्सा है। फिर भी, जेएमएम के नेता हेमंत सोरेन ने ममता बनर्जी के लिए प्रचार किया और कांग्रेस का समर्थन नहीं किया। उन्होंने पश्चिम बंगाल में अपनी पार्टी का उम्मीदवार भी नहीं उतारा, जबकि झारखंड से सटे क्षेत्रों में आदिवासी आबादी काफी है। हेमंत ने ममता को नुकसान न पहुंचाने के लिए ऐसा किया, जबकि असम में उन्होंने कांग्रेस के लिए उम्मीदवार उतारे थे।
तेजस्वी यादव और केजरीवाल की भूमिका
तेजस्वी यादव ने भी पश्चिम बंगाल में प्रचार किया, लेकिन उन्होंने वहां उम्मीदवार नहीं उतारे। इसके विपरीत, केरल में उन्होंने अपनी पार्टी के उम्मीदवार उतारे और प्रचार किया, जहां कांग्रेस चुनाव जीतने की उम्मीद कर रही है। अरविंद केजरीवाल का मामला अलग है, क्योंकि वे विपक्षी गठबंधन से अलग हो चुके हैं और कांग्रेस पर लगातार हमले कर रहे हैं। अगले साल पंजाब में उन्हें कांग्रेस से सीधे मुकाबला करना है।
कांग्रेस के साथ दूरी
अखिलेश यादव को अगले साल उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ना है। यदि विपक्षी पार्टियों का कांग्रेस के प्रति सद्भाव होता, तो वे पश्चिम बंगाल में तालमेल कर सकती थीं। लेकिन सभी ने कांग्रेस को अकेले लड़ने के लिए छोड़ दिया है। पिछले दो चुनावों में कांग्रेस और लेफ्ट ने मिलकर चुनाव लड़ा था, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। समाजवादी पार्टी, राजद, जेएमएम और आम आदमी पार्टी सभी कांग्रेस के साथ रहते हुए उससे दूरी बना रहे हैं। आने वाले समय में इस स्थिति से कुछ दिलचस्प घटनाक्रम देखने को मिल सकते हैं।