पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस में बगावत का नया मोड़
कोलकाता में राजनीतिक हलचल
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीतिक स्थिति में इन दिनों कई महत्वपूर्ण घटनाएं घटित हो रही हैं। तृणमूल कांग्रेस के भीतर एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां पार्टी दो गुटों में विभाजित होती नजर आ रही है। पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस में चल रही आंतरिक खींचतान अब खुलकर विद्रोह के रूप में सामने आ चुकी है। इसी संदर्भ में पार्टी ने राज्य की सभी छोटी और बड़ी समितियों को तुरंत प्रभाव से समाप्त करने का निर्णय लिया है।
पार्टी का आधिकारिक बयान
तृणमूल कांग्रेस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक बयान जारी करते हुए पश्चिम बंगाल की सभी मुख्य संगठनात्मक समितियों और सहयोगी विंग्स को भंग करने की घोषणा की है। पार्टी ने कहा है कि वह अब जमीनी स्तर पर अपने कार्यों की समीक्षा और व्यापक आत्म-निरीक्षण करेगी। इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद ही संगठन का पुनर्गठन किया जाएगा।
फर्जी दस्तखत और विद्रोह
हालांकि, पार्टी ने इस कठोर निर्णय के पीछे के विवादों का सीधे तौर पर उल्लेख नहीं किया है, लेकिन राजनीतिक हलकों में यह स्पष्ट है कि यह कदम हाल ही में चल रहे 'फर्जी हस्ताक्षर' विवाद और विधायकों के एक बड़े समूह द्वारा ममता बनर्जी के खिलाफ उठाए गए कदमों के बाद उठाया गया है। बुधवार को यह संकट और गहरा हो गया जब विद्रोही विधायक विधानसभा भवन में एकजुट होकर पहुंचे।
59 विद्रोही विधायकों का दावा
तृणमूल कांग्रेस के 59 विद्रोही विधायकों ने बुधवार को पश्चिम बंगाल विधानसभा में पहुंचकर खुद को सदन के भीतर मुख्य विपक्षी दल के रूप में मान्यता देने की औपचारिक मांग की। इस विद्रोही समूह में ममता सरकार के पूर्व प्रमुख मंत्री जावेद अहमद खान, अरूप रॉय, चंद्रनाथ सिन्हा और सबीना यास्मीन जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि इनमें से कई नेता केंद्रीय जांच एजेंसियों सीबीआई और ईडी की जांच का सामना कर रहे हैं।
बागी विधायकों का समर्थन
विद्रोही विधायकों का नेतृत्व कर रहे निष्कासित विधायक संदीपान साहा और ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया है कि उनके पास सदन के दो-तिहाई से अधिक सदस्यों का समर्थन है। दरअसल, विधानसभा में कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए विद्रोही समूह को कम से कम 52 विधायकों के हस्ताक्षर की आवश्यकता थी। विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस को सौंपे गए पत्र पर 59 विधायकों ने हस्ताक्षर किए हैं।
बैठकों में घटती संख्या
ममता बनर्जी के नेतृत्व को चुनौती देने वाली इस विद्रोह की कहानी पिछले महीने से ही शुरू हो गई थी। मुख्यमंत्री आवास पर 6 मई को आयोजित विधायक दल की पहली बैठक में कुल 80 विधायकों में से केवल 69 सदस्य शामिल हुए थे। इसके बाद 19 मई को हुई बैठक में यह संख्या घटकर 64 रह गई। अंततः 31 मई को हुई अंतिम समीक्षा बैठक में केवल 19 वफादार विधायक ही ममता बनर्जी के साथ दिखाई दिए।