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पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस में बढ़ता आंतरिक विवाद

पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस में आंतरिक विवाद गहराता जा रहा है, जिसमें बागी विधायकों ने नेतृत्व परिवर्तन की दिशा में कदम उठाए हैं। हाल ही में हुई बैठक में नए संगठनात्मक ढांचे का गठन किया गया है, जिसमें अरूप रॉय को चेयरमैन नियुक्त किया गया। पार्टी के भीतर विभिन्न गुटों के उभरने से एकजुटता पर सवाल खड़े हो गए हैं। इसके साथ ही, चुनाव चिन्ह और फंड को लेकर कानूनी विवाद भी बढ़ता जा रहा है। इस राजनीतिक स्थिति का क्या परिणाम होगा, यह देखना दिलचस्प होगा।
 

पार्टी में बढ़ती खींचतान


नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस में आंतरिक संघर्ष गहराता जा रहा है। पार्टी के भीतर की खींचतान अब एक खुली राजनीतिक लड़ाई में बदलती नजर आ रही है। सोमवार को बागी गुट ने कई महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए नेतृत्व परिवर्तन की दिशा में कदम बढ़ाए।


बैठक में लिए गए निर्णय

न्यू टाउन के एक होटल में आयोजित बैठक में बागी विधायकों और विभिन्न जिलों के पार्षदों ने भाग लिया। बैठक के बाद ऋतब्रत बनर्जी के गुट ने यह दावा किया कि संगठनात्मक पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इस दौरान अभिषेक बनर्जी को निलंबित करने और पार्टी नेतृत्व में बदलाव का प्रस्ताव पारित किया गया।


नई समिति का गठन

बैठक में वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को नई संगठनात्मक समिति का चेयरमैन नियुक्त किया गया। इसके साथ ही, उन्हें ममता बनर्जी की जगह पार्टी का नया चेयरपर्सन घोषित करने की जानकारी भी दी गई। बागी नेताओं का कहना है कि यह कदम पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को फिर से सक्रिय और संवैधानिक रूप से व्यवस्थित करने के लिए उठाया गया है।


संवैधानिक संकट का हवाला

ऋतब्रत बनर्जी ने बैठक में कहा कि पार्टी के संविधान के अनुसार समय पर राष्ट्रीय कार्यकारी समिति का गठन आवश्यक था। उनका आरोप है कि पिछले कार्यकाल की समाप्ति के बाद संगठन का पुनर्गठन नहीं किया गया, जिससे नेतृत्व और संरचना को लेकर असमंजस की स्थिति उत्पन्न हुई। इस समस्या को हल करने के लिए यह पहल की गई है।


पार्टी में विभाजन के संकेत

हालिया घटनाक्रम के बाद तृणमूल कांग्रेस में विभिन्न शक्ति केंद्र उभरते दिखाई दे रहे हैं। एक ओर ममता बनर्जी का मूल गुट है, जबकि दूसरी ओर ऋतब्रत बनर्जी का खेमे सक्रिय है। इसके अलावा, सांसदों का एक अन्य समूह पहले ही अलग राजनीतिक राह चुन चुका है, जिससे पार्टी की एकजुटता पर नए सवाल खड़े हो गए हैं।


चुनाव चिन्ह और फंड पर विवाद

बागी नेताओं ने संकेत दिया है कि वे पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर कानूनी लड़ाई लड़ सकते हैं। इसी बीच, पार्टी फंड को लेकर भी विवाद गहरा गया है। बागी विधायकों की शिकायत के बाद कुछ बैंक खातों में जमा धनराशि पर लेन-देन संबंधी प्रतिबंध लगाए गए हैं। धन के स्रोत और उपयोग को लेकर जांच की मांग ने इस राजनीतिक विवाद को और गंभीर बना दिया है।