पश्चिम बंगाल में भाजपा की चुनौतियाँ और ममता बनर्जी का प्रभाव
पश्चिम बंगाल का चुनावी माहौल
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक तापमान काफी बढ़ गया है। केंद्र की भाजपा सरकार ने चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस को केंद्रीय एजेंसियों के माध्यम से परेशान करना शुरू कर दिया है। दूसरी ओर, ममता बनर्जी अपने अंदाज में सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रही हैं, जिससे टकराव की स्थिति और बढ़ रही है। यदि हम वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण से देखें, तो भाजपा की ताकत और कमजोरियों का आकलन करने पर यह स्पष्ट होता है कि भाजपा के पास केवल एक नैरेटिव है। उसके पास न तो एक मजबूत संगठन है, न ही प्रभावशाली नेता और न ही भाषा या संस्कृति के माध्यम से राजनीति को प्रभावित करने की क्षमता है। इन सभी पहलुओं में वह तृणमूल कांग्रेस से कमजोर है।
भाजपा का नैरेटिव और घुसपैठियों का मुद्दा
भाजपा की प्रमुख ताकत हिंदुत्व और राष्ट्रवाद का नैरेटिव है, जिसका वह प्रभावी ढंग से राजनीतिक उपयोग करती है। इस नैरेटिव का एक महत्वपूर्ण पहलू घुसपैठियों का मुद्दा है। भाजपा का आरोप है कि ममता बनर्जी ने बांग्लादेश से आने वाले घुसपैठियों को खुला पास दे रखा है। केंद्र सरकार का कहना है कि ममता बनर्जी की सरकार सीमा पर बाड़ेबंदी के लिए जमीन नहीं देती। इसके अलावा, यह भी आरोप है कि ममता बनर्जी के कारण पश्चिम बंगाल की जनसंख्या संरचना में बदलाव आ रहा है, जिससे मुस्लिम आबादी बढ़ रही है।
भाजपा की सीमाएँ और नेतृत्व की समस्या
भाजपा की सीमाओं की बात करें तो भाषायी अस्मिता वाले राज्यों में उसे हमेशा समस्याओं का सामना करना पड़ा है। यह समस्या नेतृत्व से जुड़ी हुई है। ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा का वर्तमान नेतृत्व इस बात को समझ नहीं रहा है। यदि मोदी और शाह यह समझें कि भाषायी अस्मिता वाले राज्यों में जीत के लिए स्थानीय नेताओं की आवश्यकता है, तो यह उनके लिए फायदेमंद होगा।
स्थानीय नेताओं की भूमिका
भाजपा की सफलता के लिए एक मजबूत स्थानीय नेता या गठबंधन की आवश्यकता होती है। असम में भाजपा ने पहले ही पैर जमा लिए थे, लेकिन पश्चिम बंगाल में ऐसा कोई मजबूत स्थानीय नेतृत्व नहीं है। भाजपा का नैरेटिव केवल माहौल बनाने में मदद कर सकता है, लेकिन ममता बनर्जी के संगठन की ताकत का मुकाबला करने के लिए उसे ठोस राजनीतिक ताकत की आवश्यकता है।
भाजपा की चुनावी रणनीति
भाजपा हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और भ्रष्टाचार के नैरेटिव पर चुनाव लड़ेगी। हालांकि, इस नैरेटिव की ताकत उसे एक सीमा तक ही ले जा सकती है। आगे बढ़ने के लिए उसे ठोस और व्यावहारिक राजनीतिक ताकत की आवश्यकता है, जो अभी उसके पास नहीं है।