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पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची पर उठते सवाल: क्या होगा विधानसभा चुनाव का भविष्य?

पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस ने इस प्रक्रिया की निगरानी की है, जिसके चलते 50 लाख दावे और आपत्तियां दर्ज की गई हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इन दावों के निपटारे के लिए न्यायिक अधिकारियों की देखरेख में प्रक्रिया को सुनिश्चित किया है। हालांकि, न्यायिक अधिकारियों की कमी के कारण समयसीमा पूरी नहीं हो सकेगी। यदि मतदाता सूची पर भरोसा नहीं किया गया, तो विधानसभा चुनावों पर संदेह का साया रहेगा। अन्य राज्यों में भी एसआईआर के बाद मतदाता सूचियों में कई प्रश्न उठे हैं। क्या पश्चिम बंगाल में भी ऐसा ही होगा? जानें पूरी कहानी में।
 

मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर सवाल

क्या पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद एक ऐसी मतदाता सूची तैयार की जा सकेगी, जिस पर तृणमूल कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों को भरोसा हो? यदि ऐसा नहीं हुआ, तो विधानसभा चुनावों पर संदेह का साया मंडराएगा।


तृणमूल कांग्रेस ने राज्य में एसआईआर प्रक्रिया की निगरानी की है, जिसके परिणामस्वरूप 50 लाख दावे और आपत्तियां दर्ज की गईं। पार्टी ने इन अर्जियों के निपटारे के लिए सुप्रीम कोर्ट में भी लड़ाई लड़ी है। अदालत ने यह सुनिश्चित किया है कि इन दावों का निपटारा न्यायिक अधिकारियों की देखरेख में किया जाए। हालांकि, पश्चिम बंगाल में न्यायिक अधिकारियों की कमी के कारण, कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा है कि यह प्रक्रिया 28 फरवरी तक पूरी नहीं हो सकेगी। सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड और ओड़िशा के अधिकारियों की मदद लेने का निर्देश दिया है। फिर भी, सवाल यह है कि क्या एसआईआर के बाद एक विश्वसनीय मतदाता सूची तैयार की जा सकेगी?


यदि ऐसा नहीं हुआ, तो विधानसभा चुनाव, जिसकी तारीख जल्द ही घोषित होने वाली है, संदेह के घेरे में रहेगा। अन्य राज्यों की स्थिति पर नजर डालें, तो वहां एसआईआर के बाद जारी की गई मतदाता सूचियों में भी कई सवाल उठे हैं। उदाहरण के लिए, तमिलनाडु में पूर्व सूची से 11.5 प्रतिशत और गुजरात में 13.4 प्रतिशत नाम हटा दिए गए हैं। ये दोनों राज्य ऐसे हैं जहां काम की तलाश में लाखों श्रमिक आते हैं। तो फिर इतनी बड़ी संख्या में नाम कैसे कट गए? क्या पिछले एसआईआर के बाद जनसंख्या में इतनी गिरावट आई है? इस पर सही आंकड़े जनगणना के बाद ही मिलेंगे। वर्तमान में, सामने आई सूची पर संशय बना हुआ है। यह चर्चा का विषय है कि यदि तृणमूल कांग्रेस की तरह अन्य राज्यों में भी इस प्रक्रिया की राजनीतिक निगरानी की गई होती, तो क्या वहां भी आपत्तियों और दावों की भरमार नहीं होती और क्या इतनी आसानी से वहां की सूची जारी हो पाती?