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पाकिस्तान की राजनीतिक दुविधा: ट्रंप के दबाव में अब्राहम समझौते की चुनौती

पाकिस्तान वर्तमान में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अब्राहम समझौते के दबाव का सामना कर रहा है, जो इज़राइल को औपचारिक मान्यता देने की मांग कर रहा है। यह प्रस्ताव पाकिस्तान की राजनीतिक स्थिति को चुनौती दे रहा है, क्योंकि फिलिस्तीन का मुद्दा वहां की जनता के लिए संवेदनशील है। जानें कि कैसे यह दुविधा इस्लामाबाद के राजनीतिक गलियारों में चिंता का विषय बन गई है और शहबाज शरीफ की सरकार इस स्थिति का सामना कैसे कर रही है।
 

पाकिस्तान की नई राजनीतिक चुनौती

शेक्सपियर के नाटक हैमलेट की प्रसिद्ध पंक्ति 'टू बी और नॉट टू बी' अब इस्लामाबाद की राजनीतिक स्थिति पर लागू होती दिख रही है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान और अन्य अरब देशों के नेताओं के साथ एक उच्च स्तरीय सम्मेलन किया, जिसके बाद पाकिस्तान के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा हो गया है। रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने ईरान के साथ युद्ध समाप्त होने के बाद अधिक मुस्लिम देशों को अब्राहम समझौते में शामिल करने का प्रस्ताव रखा, जिससे इज़राइल को औपचारिक मान्यता देने का दबाव बढ़ गया। इस प्रस्ताव के बाद वहां सन्नाटा छा गया, और ट्रंप ने मजाक में पूछा कि क्या सभी अभी भी कॉल पर हैं।


पाकिस्तान की संवेदनशीलता

ईरान और अमेरिका के बीच सुलह कराने की कोशिश कर रहे पाकिस्तान के लिए ट्रंप की यह मांग अप्रत्याशित है। यह प्रस्ताव पाकिस्तान को एक कठिन स्थिति में डाल सकता है, क्योंकि फिलिस्तीन का मुद्दा वहां की जनता के लिए बेहद संवेदनशील है। इज़राइल को मान्यता देने का मतलब है एक ऐसे विस्फोटक मुद्दे को छूना जो कभी भी भड़क सकता है। सैन्य प्रतिष्ठान और शहबाज शरीफ की सरकार दोनों जानते हैं कि इज़राइल के साथ औपचारिक संबंध स्थापित करना राजनीतिक संकट का कारण बन सकता है।


अब्राहम समझौते का इतिहास

2020 में ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। उस समय इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और संयुक्त अरब अमीरात तथा बहरीन के विदेश मंत्री भी मौजूद थे। हालांकि, पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान ने इस समझौते में शामिल होने से इनकार किया था, यह कहते हुए कि यह पाकिस्तान के दो-राज्य समाधान के समर्थन के खिलाफ होगा। खान ने कहा था कि इज़राइल को मान्यता देने का विचार उनके लिए अस्वीकार्य है।


पाकिस्तान की राजनीतिक स्थिति

यह भी ध्यान देने योग्य है कि कई पाकिस्तानी इस कदम को देश के संस्थापक सिद्धांतों के खिलाफ मानेंगे। पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना ने इज़राइल के निर्माण का विरोध किया था। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान, जो अक्सर फिलिस्तीन और कश्मीर की तुलना करता है, इस बात से चिंतित है कि दो-राज्य समाधान को छोड़ना कश्मीर मुद्दे पर भारत के खिलाफ उनकी स्थिति को कमजोर कर सकता है।


आगे की राह

इमरान खान ने हाल ही में कहा था कि वह तब तक अपनी आवाज उठाते रहेंगे जब तक कि शहबाज शरीफ की सरकार को हटाया नहीं जाता। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि शहबाज सरकार को इज़राइल को मान्यता देने का काम सौंपा गया है। ऐसे में अब्राहम समझौते में शामिल होने की दिशा में कोई भी कदम उठाने से पहले इस्लामाबाद को घरेलू राजनीतिक प्रभाव का डर सताएगा। शहबाज शरीफ की सरकार ने अब तक बेहद सावधानी से कदम बढ़ाए हैं।


अमेरिका का दबाव

हाल ही में अमेरिका के नए दबाव के बाद अब बड़ा सवाल यह है कि जब पाकिस्तान पहले से ही अमेरिका के लिए 'शांतिदूत' की भूमिका निभा रहा है, तो वह इस प्रस्ताव को कब तक नजरअंदाज कर पाएगा। यह दुविधा इस्लामाबाद के राजनीतिक गलियारों में चिंता का विषय बन गई है।