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पी चिदंबरम का मतदाता सूची पर सवाल: क्या हैं वास्तविकता के पीछे के तथ्य?

कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने मतदाता सूची में गायब नामों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने बताया कि औसतन 10 प्रतिशत वयस्क मतदाता सूची से गायब हैं और इसके पीछे के कारणों पर चर्चा की है। क्या ये नाम कटने के पीछे प्रवासन और जनगणना के आंकड़े हैं? जानें उनके विश्लेषण में क्या तथ्य छिपे हैं और क्या यह केवल राजनीतिक पूर्वाग्रह है।
 

मतदाता सूची में गायब नामों का रहस्य

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने 22 मार्च को अपने साप्ताहिक कॉलम में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान कटने वाले नामों के आंकड़े साझा किए। उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि औसतन 10 प्रतिशत वयस्क मतदाता सूची से गायब हैं। उन्होंने यह सवाल उठाया कि क्या ये गायब लोग वयस्क और नागरिक हैं, और यदि हां, तो उनके नाम क्यों हटाए गए हैं।


चिदंबरम ने विभिन्न राज्यों के आंकड़े प्रस्तुत किए, जिसमें बिहार में 6 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ में 12 प्रतिशत, और तमिलनाडु में 12.5 प्रतिशत नाम कटने की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि बिहार में पहले 96.7 प्रतिशत वयस्कों के नाम मतदाता सूची में थे, जो अब घटकर 90.7 प्रतिशत रह गए हैं।


तमिलनाडु के आंकड़े सबसे दिलचस्प हैं, जहां एसआईआर से पहले 106.8 प्रतिशत नाम थे, जो अब 94.3 प्रतिशत रह गए हैं। चिदंबरम ने इस पर कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया कि ये नाम कैसे बढ़ गए थे और अब क्यों कट गए।


उन्होंने यह भी बताया कि हर राज्य में वयस्क नागरिकों की संख्या के अनुसार मतदाता सूची में नाम होने चाहिए। लेकिन क्या वे मौजूदा प्रवासन की स्थिति को नहीं समझते? 2023 में भारत में प्रवासन की दर 28.88 प्रतिशत थी, जो 2011 के मुकाबले कम है।


रिपोर्ट के अनुसार, 40 करोड़ से अधिक लोग अपने मूल निवास से दूर रहते हैं, और लगभग 3.5 करोड़ भारतीय अंतरराष्ट्रीय प्रवासन कर चुके हैं। चिदंबरम ने इन आंकड़ों को नजरअंदाज किया और केवल मतदाता सूची में कटने वाले नामों पर ध्यान केंद्रित किया।


उन्होंने यह नहीं बताया कि यदि 40 करोड़ घरेलू प्रवासी और 3.5 करोड़ अंतरराष्ट्रीय प्रवासी में से एक चौथाई भी मतदाता बन गए हैं, तो यह संख्या 11 करोड़ होगी।


चिदंबरम ने यह भी नहीं समझा कि 2011 की जनगणना के बाद के आंकड़े अनुमान पर आधारित हैं। यदि वे इन तथ्यों को ध्यान में रखते, तो उन्हें समझ में आता कि राज्यों की मतदाता सूचियां 'घोस्ट मतदाताओं' से भरी हैं।


बिहार में एसआईआर के बाद मतदान प्रतिशत में 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, लेकिन चिदंबरम ने यह सवाल नहीं उठाया कि बाकी 33 प्रतिशत लोग कहां हैं।


उन्होंने यह भी नहीं बताया कि जिनके नाम कट रहे हैं, उनके नाम पहले क्यों थे और इसका लाभ किसे मिल रहा था। यह स्पष्ट है कि भारत में मतदान प्रक्रिया में दशकों से गड़बड़ी होती रही है।


हालांकि, यह कहना गलत नहीं होगा कि एसआईआर से मतदाता सूचियों में सुधार हुआ है। चिदंबरम का सवाल पूरी तरह से राजनीतिक और पूर्वाग्रह से प्रभावित है, जो वास्तविकता से दूर है।