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प्रधानमंत्री मोदी का वैश्विक राजनीति पर जोरदार भाषण: क्या है भारत की भूमिका?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में एक कार्यक्रम में वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तनों पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की चुनौतियों, कांग्रेस की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए, और भारत की बढ़ती जिम्मेदारी पर जोर दिया। मोदी ने चाणक्य के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए वैश्विक व्यवस्था की आवश्यकता को समझाया और कोविड-19 महामारी के दौरान भारत के सहयोग का उदाहरण दिया। उन्होंने 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य का भी जिक्र किया। उनके संबोधन का मुख्य संदेश था कि बदलती दुनिया में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को अधिक प्रभावी बनाना चाहिए।
 

दिल्ली में मोदी का महत्वपूर्ण संबोधन


गुरुवार को, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में एक निजी समाचार चैनल के कार्यक्रम में वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तनों पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने बताया कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में तेजी से बदलाव आ रहा है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं नई चुनौतियों का सामना करने में कठिनाई महसूस कर रही हैं। मोदी ने व्यापार, तकनीक और समुद्री मार्गों पर बढ़ते तनाव का उल्लेख करते हुए कहा कि इनका उपयोग अब दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है। उनके भाषण में वैश्विक सहयोग, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की प्रभावशीलता और भारत की बढ़ती जिम्मेदारी जैसे मुद्दे प्रमुख रहे।


प्रधानमंत्री ने विपक्ष पर भी तीखा हमला किया। उन्होंने कहा कि जब दुनिया एक नई वैश्विक व्यवस्था की तलाश में है, तब कुछ लोग भारत में अव्यवस्था की उम्मीद लगाए बैठे हैं। कांग्रेस पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने सवाल किया कि पार्टी कब तक एक असफल उत्पाद को दोबारा पेश करने की कोशिश करती रहेगी। यह टिप्पणी राहुल गांधी पर उनके पूर्व के राजनीतिक तंज की अगली कड़ी थी।


कांग्रेस की कार्यशैली पर सवाल

मोदी ने कांग्रेस की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि पार्टी दूसरों की राजनीतिक प्रगति में बाधा डालने वाली परजीवी प्रवृत्ति की तरह काम करती है। उन्होंने कहा कि सत्ता से बाहर होने के बाद कांग्रेस का रवैया व्यवस्था के प्रति नकारात्मक हो गया है।


चाणक्य के सिद्धांत से वैश्विक व्यवस्था की आवश्यकता

प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में प्राचीन भारतीय विचारक चाणक्य का उल्लेख करते हुए 'मत्स्य न्याय' की अवधारणा को समझाया। उन्होंने संस्कृत सूत्र 'अप्रणीतः तु मत्स्यन्यायमुद्भावयति' का संदर्भ दिया, जिसमें बताया गया है कि जब कानून और दंड व्यवस्था प्रभावी नहीं रहती, तब ताकतवर कमजोर पर हावी हो जाता है। इसे उन्होंने बड़ी मछली द्वारा छोटी मछली को निगल जाने की स्थिति से समझाया।


मोदी के अनुसार, आज दुनिया को ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की आवश्यकता है जो शक्तिशाली देशों को कमजोर राष्ट्रों पर मनमाना दबाव बनाने से रोक सके। उन्होंने कहा कि भारत इसी तरह की व्यवस्था और सहयोग को मजबूत करने की दिशा में प्रयासरत है।


महामारी के दौरान भारत का सहयोग

भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमिका पर बात करते हुए प्रधानमंत्री ने कोविड-19 महामारी के दौरान भारत द्वारा 100 से अधिक देशों को दवाइयां और मुफ्त टीके उपलब्ध कराने का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रयास यह दर्शाते हैं कि अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी केवल सामान्य परिस्थितियों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। संकट के समय भी देशों के बीच सहयोग और सहायता का सिलसिला जारी रहना आवश्यक है। मोदी ने कहा कि भारत अपनी क्षमताओं को मजबूत कर रहा है, ताकि वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में और प्रभावी योगदान दिया जा सके।


ग्लोबल साउथ और विकसित भारत की परिकल्पना

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में विकासशील देशों की आवाज को अधिक महत्व मिलना चाहिए। उन्होंने 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य का भी उल्लेख किया। मोदी ने इस उद्देश्य को केवल भारत की प्रगति तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे बेहतर वैश्विक भविष्य से भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि भारत का विकास दुनिया के लिए सकारात्मक अवसर पैदा कर सकता है।


संयुक्त राष्ट्र की भूमिका और नई चुनौतियां

प्रधानमंत्री ने दूसरे विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के ऐतिहासिक संदर्भ को याद किया। उन्होंने कहा कि उस समय दुनिया ने सम्मान, सहयोग और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान की आवश्यकता को समझा था। हालांकि, आज चुनौतियों का स्वरूप बदल गया है और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को भी अपनी कार्यप्रणाली को उसी के अनुसार विकसित करना होगा। मोदी ने व्यापार के रणनीतिक उपयोग और समुद्री मार्गों पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का उल्लेख करते हुए कहा कि नई वास्तविकताओं को वैश्विक व्यवस्था में जगह देना आवश्यक है। उनके संबोधन का मुख्य संदेश यह था कि बदलती दुनिया में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को अधिक प्रभावी बनाना चाहिए और भारत को अपनी वैश्विक भूमिका को मजबूत करना चाहिए।