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प्रधानमंत्री मोदी की इजराइल यात्रा: कूटनीतिक गलती या जानबूझकर की गई चाल?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजराइल यात्रा को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। क्या यह एक कूटनीतिक गलती थी या इजराइल ने जानबूझकर ऐसा किया? यात्रा के तुरंत बाद ईरान पर हमले की योजना के संदर्भ में भारत की खुफिया एजेंसियों की भूमिका पर भी चर्चा हो रही है। जानें इस विवाद के पीछे की सच्चाई और क्या यह भारत की कूटनीति को प्रभावित करेगा।
 

प्रधानमंत्री मोदी की इजराइल यात्रा का समय

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजराइल यात्रा एक विवादास्पद समय पर हुई। उन्होंने दो दिन की यात्रा के बाद इजराइल की संसद को संबोधित किया और लौटने के तुरंत बाद, इजराइल और अमेरिका ने ईरान पर हमले की योजना को अंजाम दिया। यह ध्यान देने योग्य है कि अमेरिका कई महीनों से इस हमले की तैयारी कर रहा था। उसने अपने दो प्रमुख युद्धपोत, यूएसएस अब्राहम लिंकन और यूएसएस गेराल्ड फोर्ड, अरब सागर में तैनात कर दिए थे। इसके अलावा, दो सौ से अधिक लड़ाकू विमानों को खाड़ी देशों में अपने सैन्य ठिकानों पर भेजा गया था। यह सब कुछ सार्वजनिक रूप से हो रहा था, जिससे सभी को स्थिति की जानकारी थी। ट्रंप लगातार हमले की चेतावनी दे रहे थे। इसके बावजूद, मोदी की इजराइल यात्रा जारी रही।


कूटनीतिक गलती या जानबूझकर की गई चाल?

अब यह सवाल उठता है कि क्या यह एक कूटनीतिक गलती थी, या इजराइल ने जानबूझकर ऐसा किया, या फिर दोनों ही बातें सही हैं? इजराइल के प्रमुख पत्रकार और सामरिक विशेषज्ञ बराक रैविड ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में बताया कि इजराइल और अमेरिका ने हमले का निर्णय एक हफ्ते पहले ही ले लिया था और इसकी तैयारी पूरी कर ली थी। यदि उन्होंने 28 फरवरी को हमले का निर्णय लिया था, तो मोदी को बुलाने का क्या कारण था? उन्हें यात्रा से क्यों नहीं रोका गया? भारत की खुफिया एजेंसियों और कूटनीतिक मिशनों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठता है कि उन्होंने इस यात्रा की अनुमति कैसे दी। सामान्य कूटनीति और शिष्टाचार के अनुसार, ऐसे देशों को संभावित युद्ध क्षेत्रों का दौरा नहीं करना चाहिए, जो तटस्थता का पालन करते हैं। यदि भारत को इजराइल के साथ युद्ध में शामिल होना होता, तो यह एक अलग मामला होता।